इनर मंगोलिया में चीनी आतंक?

का नाम बहुत लोगों ने सुना होगा, लेकिन शायद ‘इनर मंगोलिया’ का नहीं। चीन के उत्तर में मंगोलिया नाम का एक छोटा-सा देश है और इसकी जनसंख्या लगभग 30 लाख है।

यहाँ के लोग मंगोल नस्ल के हैं और इनकी भाषा मंगोल है। आज का इनर मंगोलिया भी इन्हीं मंगोलों का इलाका था। द्वितीय विश्व-युद्ध के बाद यह कम्युनिस्ट चीन के कब्ज़े में आ गया और चीनी सरकार ने इसे एक स्वायत्त क्षेत्र घोषित करके इसे अपने अधीन कर लिया।

समानता का खोखला दावा

चीन का संविधान कहता है कि सभी नस्ल, धर्म और भाषाओं के लोगों को चीन में समान अधिकार प्राप्त हैं। लेकिन व्यवहार में यह दिखता नहीं है। वास्तविकता यही है कि चीनी सरकार देश के सभी हिस्सों में केवल मंदारिन (चीनी) भाषा और हान-वंश के लोगों का प्रभुत्व चाहती है। तिब्बत और शिंजियांग में जो हो रहा है, उसके बारे में पूरे विश्व में बहुत चर्चा होती है। लेकिन इनर मंगोलिया के बारे में शायद ही कोई जानता हो। 

मंगोलिया देश की जनसंख्या लगभग 30 लाख है, जबकि इनर मंगोलिया की लगभग ढाई करोड़। द्वितीय विश्व-युद्ध के बाद इस क्षेत्र पर अधिकार करने के बाद से ही चीन सरकार लगातार यहाँ के मूल निवासियों की संख्या और शक्ति को कम करने की नीति पर काम करती आ रही है। इसी नीति के अन्तर्गत चीनी हान वंश के लोगों को बड़ी संख्या में इस इनर मंगोलिया क्षेत्र में बसाया गया है और अब उनकी जनसंख्या मंगोलियाई मूल के लोगों से लगभग पाँच-छह गुना अधिक हो गई है। तिब्बत पर कब्जे के बाद से चीन ने यही काम वहाँ भी किया है।

धार्मिक स्वतंत्रता पर आघात

लेकिन तिब्बतियों और मंगोलियाई लोगों के बीच समानता केवल इतनी नहीं है कि ये दोनों ही चीनी वामपंथी सरकार द्वारा लगातार प्रताड़ित किए जा रहे हैं। इनकी धार्मिक मान्यताओं में भी समानता है।

पूरे चीन का प्रमुख धर्म बौद्ध है, किन्तु धर्म से वामपंथियों का बैर भी जगजाहिर है। चीनी कम्युनिस्ट सरकार ने भी बौद्ध-धर्म की व्याख्या अपनी सुविधा से करने और लोगों की धार्मिक गतिविधियों पर भी नियंत्रण रखने के उद्देश्य से बुद्धिस्ट एसोसिएशन ऑफ़ चाइना नाम से एक संस्था का गठन किया, जिसका नियंत्रण चीनी कम्युनिस्ट पार्टी के हाथों में ही है।

चीन के लोगों को केवल इसी बौद्ध संप्रदाय को मानने की छूट है। लेकिन तिब्बत और इनर मंगोलिया के लोग इस संप्रदाय के अनुयायी नहीं है। वे तिब्बती बौद्ध संप्रदाय के अनुयायी हैं और दलाई लामा को अपना सर्वोच्च धार्मिक गुरु मानते हैं। स्वाभाविक है कि इस कारण भी चीनी सरकार इनर मंगोलिया के लोगों से नाराज़ रहती है क्योंकि दलाई लामा चीन के घोषित शत्रु हैं।

भाषा पर प्रतिबंध

तिब्बत और इनर मंगोलिया की संस्कृतियाँ अत्यंत प्राचीन हैं। उसी के साथ-साथ उनकी भाषाएं और लिपियाँ भी बहुत प्राचीन हैं। मंगोलियाई लिपि संभवतः विश्व की अकेली ऐसी लिपि है, जो ऊपर से नीचे की ओर लिखी जाती है (तुलना के लिए इसे ऐसे समझें कि हिन्दी और अंग्रेज़ी भाषाएं बाएं से दाएं, जबकि हिब्रू या अरबी आदि भाषाएं दाएं से बाएं लिखी जाती हैं)।

मंगोलियाई लिपि की प्राचीनता और विशेषता के कारण यूनेस्को ने भी 2013 में इसे विश्व-विरासत की सूची में दर्ज किया है। मंगोलिया (देश) बहुत समय तक वामपंथी सोवियत रूस के अधीन रहा। इस दौरान रूसी वामपंथियों ने मंगोलिया की प्राचीन लिपि को हटाकर उन पर रूसी लिपि लाद दी। अब मंगोलिया के लोग अपनी भाषा रूसी लिपि में लिखते हैं, लेकिन चीनी कब्ज़े वाले इनर मंगोलियाई लोगों ने इतने वर्षों की गुलामी के बावजूद भी अपनी भाषा, धर्म-संस्कृति और परंपराओं को छोड़ा नहीं है। चीनी वामपंथी सरकार उसी को मिटाने के प्रयास में लगी है और अब इस बात को लेकर इनर मंगोलिया में चीन के विरुद्ध एक बड़ा आंदोलन शुरू हो गया है।

नया सरकारी आदेश

इसकी शुरुआत चीनी सरकार के एक नए आदेश से हुई।

इनर मंगोलिया में छात्रों के पास पढ़ाई के लिए पहले चीनी के साथ-साथ मंगोलियाई भाषा का भी विकल्प होता था। चीनी सरकार ने धीरे-धीरे इसे रोकना शुरू किया। मंगोलियाई माध्यम से पढ़ाई करने वालों छात्रों के लिए पहले लगभग दो लाख सीटें उपलब्ध होती थीं, जिसे काम करते-करते अब केवल सत्रह हजार कर दिया गया है और उनके बदले चीनी भाषा में पढ़ाई की सीटें बढ़ा दी गई हैं।

इसके बावजूद भी छात्रों के पास कम से कम साहित्य, इतिहास और राजनीति विषय मंगोलियाई भाषा में पढ़ने की सुविधा उपलब्ध थी। लेकिन इस वर्ष चीनी सरकार ने नई शिक्षा नीति की घोषणा की और यह आदेश जारी कर दिया कि अब सितंबर में नए सत्र से इन विषयों की पढ़ाई भी केवल चीनी भाषा में ही होगी। इसका सीधा अर्थ यह है कि अब मंगोलियाई लोगों से उनकी भाषा में शिक्षा का अधिकार छीन लिया गया है। 

मंगोलियाई लोग भाषा को अपनी आत्मा मानते हैं। मंगोलिया में एक कहावत है कि भाषा किसी भी व्यक्ति की पहचान होती है और यदि उसके पास उसकी भाषा ही न हो, तो उसका कोई अस्तित्व भी नहीं है। चीनी सरकार लगातार इसी भाषा को नष्ट करने के प्रयासों में लगी हुई है।

लोगों में आक्रोश

यह आदेश जारी होने के बाद से इनर मंगोलिया के लोग लगातार इसका विरोध कर रहे हैं। अभिभावकों ने कह दिया है कि अपने बच्चों को चीनी भाषा का गुलाम बनाने की बजाय हम उन्हें घर पर ही पढ़ाएंगे। 1000 बच्चों की क्षमता वाले एक स्कूल में तो इस वर्ष केवल चालीस बच्चों ने एडमिशन करवाया और उनमें से भी केवल 10 बच्चे ही पहले ही दिन स्कूल आए। पूरे प्रांत में लगभग 3 लाख बच्चों ने स्कूलों का बहिष्कार कर दिया है।

इस विरोध को कुचलने के लिए चीनी सरकार ने हजारों लोगों के खिलाफ़ अरेस्ट वॉरंट जारी कर दिए हैं और पुलिस बच्चों को जबरन से घरों से निकालकर स्कूलों में ले जाने के प्रयास कर रही है, जबकि अभिभावक उन्हें वापस घर ले जाने के लिए संघर्ष कर रहे हैं। इस कारण लगभग रोज ही लोगों की पुलिस से झड़पें हो रही हैं। चीनी सरकार के नियंत्रण वाले मंगोलियाई टीवी चैनल के तीन सौ कर्मचारियों ने इसके विरोध में सरकार के खिलाफ़ हड़ताल पर चले जाने की चेतावनी दी है।

सोशल मीडिया पर भी अभियान

सोशल मीडिया पर भी इसके विरुद्ध माँगोलियाई लोग आवाज़ उठा रहे हैं। मंगोलियाई भाषा में बाइनू नाम से उनका अपना सोशल मीडिया प्लेटफ़ॉर्म था, जिस पर चीन की सरकार ने बैन लगा दिया है। लेकिन लोग अपने आंदोलन और पुलिस के अत्याचारों के वीडियो बनाकर अन्य माध्यमों से सीमा के उस पार मंगोलिया देश में अपने दोस्तों और रिश्तेदारों को भेजते हैं, और उनके माध्यम से यह जानकारी दुनिया-भर में पहुँच रही है।

एक ऑनलाइन याचिका की भी शुरुआत हुई है, जिस पर अभी तक तीस हजार से ज़्यादा लोगों ने अपना समर्थन जताया है। जैसे तिब्बतियों और उईगर मुस्लिमों के पक्ष में पूरे विश्व में आवाज़ उठ रही है, उसी प्रकार विदेशों में रह रहे इनर मंगोलियाई लोग भी अपने-अपने देशों की सरकारों से मांग उठा रहे हैं कि चीनी सरकार द्वारा किए जा रहे इस अत्याचार के खिलाफ लड़ने में इनर मंगोलिया के लोगों की भी मदद करें।

पूरे विश्व में चीन की बढ़ती मुसीबतें

स्पष्ट है कि चीन केवल हांगकांग, ताईवान और इधर लद्दाख में भारत से ही नहीं, बल्कि तिब्बत, शिंजियांग और अब इनर मंगोलिया में भी भारी मुसीबतों में घिरा हुआ है। उधर हिन्द महासागर में भी भारत, जापान, ऑस्ट्रेलिया व अमेरिका उसके खिलाफ खड़े हो रहे हैं और दक्षिण चीन सागर में चीनी नौसेना के उत्पात के कारण उस क्षेत्र के की देश भी चीन से नाराज़ हैं।

कुछ समय पहले यह खबर भी आई थी कि वन बेल्ट वन रोड प्रोजेक्ट के नाम पर सस्ते ब्याज वाला कर्ज देने की आड़ में कमजोर देशों को आर्थिक गुलामी में धकेलने की चीनी सरकार की नीति के खिलाफ कुछ अफ्रीकी देश भी अब आवाज़ उठाने लगे हैं। कोरोना वायरस के कारण भी यूरोप से लेकर अमरीका तक कई देश चीन के विरोध में खुलकर या इशारों में बोल रहे हैं।

ऐसा लगता है कि अपनी तानाशाही और विस्तारवादी नीतियों के कारण चीनी सरकार ने एक साथ पूरे विश्व में अपने कई दुश्मन बना लिए हैं। अब इन सब संकटों से चीन निकल पाएगा या नहीं, इसका जवाब तो भविष्य में ही मिलेगा।

(स्त्रोत: द डिप्लोमैट, बीबीसी, वॉशिंगटन पोस्ट, विकिपीडिया आदि)
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