निरीक्षण और निष्कर्ष

एक होता है निरीक्षण और एक होता है निष्कर्ष। ये दोनों अलग बातें हैं।

निरीक्षण का मतलब घटनाक्रम को देखना और समझने का प्रयास करना। निष्कर्ष का मतलब उस निरीक्षण के आधार पर अपनी राय तय करना।

मैंने स्कूल-कॉलेज पढ़ाई-लिखाई चाहे जिस भी विषय में की हो, लेकिन मैं ऐसा मानता हूँ कि मैं हमेशा से ही भाषा, इतिहास और राजनीति का विद्यार्थी रहा हूँ और आज भी हूँ। राजनीति और इतिहास के मामले में मैं अपनी क्षमता और समझ के अनुसार हमेशा घटनाओं का बहुत बारीकी से निरीक्षण करता हूँ, और आगे के अनुमान लगाने का प्रयास करता हूँ, लेकिन सामान्यतः मैं कोई निष्कर्ष निकालने के झंझट में नहीं पड़ता। अपने लेखों में भी मैं केवल अपने निरीक्षण और अनुमान प्रस्तुत कर देता हूँ, लेकिन कई लोग अक्सर उसे ही मेरी विचारधारा या मेरी राय या निष्कर्ष समझ लेते हैं। ऐसा शायद इसलिए होता है कि अधिकांश लोग अक्सर ही या तो केवल विचारधारा के आधार पर या फिर पर्याप्त निरीक्षण के बिना ही हर घटना का निष्कर्ष निकाल लेते हैं। इसलिए शायद मेरे निरीक्षण को भी वे मेरा निष्कर्ष ही समझ लेते हैं।

हर राजनेता, हर पार्टी, हर सरकार के काम करने का अपना-अपना तरीका होता है। यदि आप थोड़ा ध्यान से निरीक्षण करेंगे, तो हर किसी के काम का पैटर्न आसानी से समझ सकते हैं।

यदि आप वामपंथी सरकारों या विचारधारा को देखें, तो एक अद्भुत पैटर्न है। वामपंथियों से ज्यादा क्रूर और तानाशाही शासक शायद ही कोई और हुए होंगे। जितनी हिंसा और जितने अन्याय वामपंथी सरकारों ने लोगों पर किए हैं, उनकी तुलना भी किसी और से करना कठिन है, लेकिन उनके भाषणों, पुस्तकों और सिद्धांतों में वे लोग आपको हमेशा मानवीय मूल्यों, समानता, न्याय जैसी बातें कहते हुए मिलेंगे। नक्सलवाद और आतंकवाद में लिप्त होकर भी वे मानवाधिकारों पर अधिकारपूर्वक लेक्चर दे सकते हैं। लोकतांत्रिक व्यवस्थाओं को तबाह करके तानाशाही लादने के बाद भी वे उसे जनता की सरकार और जनवादी गणतंत्र और जनमुक्ति सेना आदि जैसे आकर्षक नाम देते हैं।

अपने नेहरुजी भी पक्के वामपंथी थे और यह बात आपको उनकी कार्यशैली में भी स्पष्ट दिखाई देगी। स्वतंत्रता आन्दोलन के समय कांग्रेस की राजनीति में भी और स्वतंत्रता के बाद प्रधानमंत्री के रूप में अपने पूरे कार्यकाल में भी उन्होंने हमेशा ही तानाशाह के समान आचरण किया। उस जमाने में विपक्ष का तो लगभग कोई अस्तित्व ही नहीं था, लेकिन उन्होंने डॉ. राजेन्द्र प्रसाद, डॉ.आंबेडकर और सरदार पटेल जैसे लोगों के साथ भी जो अपमानजनक व्यवहार किया, वह उनकी कार्यशैली और प्रवृत्ति को समझने के लिए पर्याप्त है। इसके बावजूद भी उन्होंने वामपंथियों की ही तरह हमेशा अपनी लोकतंत्रवादी छवि बनाए रखी।

इंदिरा गांधी को राजनीति में अपनी जगह बनाने और प्रधानमंत्री पद तक पहुँचने के लिए अपनी ही पार्टी के लोगों से निपटना पड़ा था। इसलिए उनके मन में हमेशा डर बना रहता था कि कोई न कोई उनके खिलाफ साजिश कर रहा है और इसलिए उसे पूरी मिटाना आवश्यक है। उनका यही डर उन्हें यह बताता था कि हर बात या तो विपक्षियों की साजिश है या देश-विरोधी ताकतों की। इसलिए चाहे पाकिस्तान का मामला हो या राजनीति का, वे हमेशा टकराव के विकल्प को ही चुनती थीं, फिर बात चाहे युद्ध की हो या आपातकाल लगाकर देश में लोकतंत्र को कुचलने की। वैसे भी उनके विरोधियों से ज्यादा उनके समर्थक ही आज भी गर्व से बताते फिरते हैं कि वे कितनी बड़ी तानाशाह थीं, इसलिए उनके बारे में अलग से कोई उदाहरण देकर समझाना अनावश्यक है।

राजीव गांधी की कार्यशैली इन दोनों से ही बिलकुल अलग थी। कन्फ्यूजन या राजनैतिक सूझबूझ की कमी के मामले में आज राहुल गांधी को लोग चाहे जो भी कहते हों, लेकिन राजीव जी इस मामले में भी राहुल जी के पिता थे। वे राजनैतिक व्यक्ति नहीं थे और न उन्हें राजनीति के किसी भी मामले की समझ थी। लेकिन फिर भी वे हर मामले में फैसला लेने को उतावले रहते थे। इसी कारण उन्होंने शाहबानो के मामले में सुप्रीम कोर्ट के फैसले के बावजूद अनावश्यक दखल दिया, फिर अयोध्या में शिलान्यास की अनुमति देकर भाजपा को राजनैतिक मुद्दा पकड़ा दिया, कश्मीर के चुनाव में जबरन दखल देकर वहां हिंसा और आंतकवाद की नींव डाली और फिर श्रीलंका में सेना भेजकर सबका नुकसान किया।

इसके विपरीत अटल जी कवि-हृदय वाले सौम्य व्यक्ति थे। चाहे पाकिस्तान का मामला रहा हो या सरकार चलाने का, उन्होंने जहाँ तक संभव हुआ हमेशा टकराव से बचने और शान्ति से हल निकालने के प्रयास किए। मेरा अनुमान है कि यदि अटल जी आज प्रधानमंत्री होते, तो किसान क़ानून के मामले में विरोध-प्रदर्शन को जन-भावना मानकर क़ानून वापस लेने की घोषणा कर देते। इसके विपरीत सोनिया जी की सरकार होती, तो डंडे चलवाकर आन्दोलन खत्म करवा देती।

मोदी-शाह की अपनी अलग ही तरह की कार्यशैली है। उनसे सहमति या असहमति एक अलग मुद्दा है, लेकिन यदि आप पिछले कुछ वर्षों का उनका काम करने का तरीका देखें, तो आपको उसमें भी एक पैटर्न दिखेगा। उनका तरीका सही है या गलत, ये बात और है। लेकिन उनका अपना तरीका है यह बात सही है।

मेरा निरीक्षण ये है कि इन दोनों में धैर्य और अनुशासन बहुत ज्यादा है और तालमेल तो गजब का है। अटल जी और आडवाणी जी या सोनिया गांधी और मनमोहन सिंह के बीच कई बार यह स्पष्ट दिख जाता था कि दोनों में मतभेद हैं। लेकिन मोदी-शाह के मामले में ऐसा लगभग न के बराबर दिखता है। दो अलग व्यक्ति हैं, तो मतभेद तो होंगे ही, लेकिन उन दोनों में तालमेल इतना गजब का है कि मतभेदों को अलग रखना वे हमेशा एक लक्ष्य के लिए साथ काम करते हैं।

आज 2021 चल रहा है, लेकिन आप 2014 के लोकसभा चुनाव को याद करके देखिये। उसके लिए अपनी तैयारी इन लोगों ने 2011-12 में ही प्रारंभ कर दी थी। उस चुनाव में सामने केजरीवाल की कलाबाजियां भी चलती रहती थीं। वो वाराणसी में मोदी जी के खिलाफ चुनाव लड़ने भी पहुँच गए थे। आम आदमी पार्टी वालों ने मोदी को चाहे जितना उकसाने की कोशिश की, लेकिन मोदी जी ने पूरे चुनाव प्रचार के दौरान एक बार भी केजरीवाल का नाम तक नहीं लिया। विपक्षियों ने इस बात के लिए एड़ी चोटी का जोर लगा दिया था कि चुनाव का फोकस सोनिया सरकार के समय के भ्रष्टाचार और कुशासन के मुद्दे से हटकर मोदी बनाम केजरीवाल पर हो जाए, लेकिन मोदी ने अपना निशाना कांग्रेस से हटाया ही नहीं।

अमित शाह उस समय लगभग अदृश्य थे, जबकि वे उप्र जैसे कठिन राज्य को सम्भाल रहे थे और जब चुनाव का परिणाम आया, तो उप्र में भाजपा की ऐतिहासिक जीत ने सबको हिला दिया। कोई भी इस बात को ठीक से समझ ही नहीं पाया कि अमित शाह ने उप्र जैसे राज्य में एकतरफा इतनी सीटें जीतने का चमत्कार किया कैसे!

चुनाव के बाद अगर चाहते तो अमित शाह को सरकार में शामिल करना कोई कठिन बात नहीं थी। आप आधुनिक भारतीय राजनीति के पूरे इतिहास को देख लीजिए। लगभग हर मामले में आपको यही दिखेगा कि जब कोई पार्टी सत्ता में होती है, तो उसके सभी प्रमुख नेता सरकार चला रहे होते हैं। शिवसेना के बालासाहब ठाकरे जैसे एकाध अपवाद ही आपको मिलेंगे जो सरकार और पार्टी दोनों से अलग रहकर भी सबकुछ अपने नियंत्रण में रख सकते थे।

लेकिन सरकार बनाने के बाद भी मोदी जी ने अमित शाह को शामिल नहीं किया और अमित शाह ने भाजपा अध्यक्ष के रूप में जो काम किए हैं, उनसे यह भी स्पष्ट है कि अमित शाह को उस समय सरकार से बाहर रखना भी इन दोनों का आपसी फैसला ही था, उसमें कोई मतभेद या खींचतान नहीं थी।

उस समय बहुत-से भाजपा समर्थक नाराज़ रहते थे कि समान नागरिक संहिता, राम मंदिर, धारा 370 जैसे मुद्दे कब सुलझेंगे। वाजपेयी जी के समय तो गठबंधन की मजबूरी बताई जाती थी, लेकिन मोदी सरकार के पास तो पूरा बहुमत था, फिर भी मोदी सरकार ने इनमें से किसी भी मुद्दे को सीधे हाथ नहीं लगाया बल्कि काश्मीर में मुफ़्ती के साथ मिलकर सरकार भी बनाई और सोशल मीडिया पर समर्थकों से गलियाँ खाईं। लेकिन बाद में सही समय आने पर मुद्दा जड़ से निपटा दिया।

अयोध्या के बारे में भी कई समर्थक चिल्लाते थे कि मोदी जी के पास दुनिया भर में घूमने की फुर्सत है लेकिन अयोध्या जाने का समय नहीं है। मोदी जी ने भी कभी अयोध्या और राम मंदिर के बारे में एक शब्द नहीं कहा, लेकिन अयोध्या का मामला भी अब पूरी तरह हल हो चुका है।

पाकिस्तान के मामले में भी पहले-पहल लोग यही कहते थे कि मोदी सरकार सिर्फ उपहार भेजती रहती है और कड़ी निंदा करती रहती है। शुरू में दो वर्षों तक यही चलता रहा, जब तक कि सेना के लिए आवश्यक हथियारों और अन्य सामान की आपूर्ति का काम पूरा नहीं हो गया। पुलवामा के हमले के बाद भी लोग आक्रोशित थे कि तुरंत पाकिस्तान पर हमला करके उसे नक़्शे से ही मिटा दिया जाए। फिर भी सरकार कुछ करती हुई नहीं दिखी, लेकिन सही समय पर सेना और सरकार ने मिलकर जिस तरह से सर्जिकल स्ट्राइक किया, उसकी कल्पना भी किसी ने नहीं की थी।

बॉलीवुड और मीडिया के मामले में भी यही बात है। सोनिया सरकार के समय राडिया के टेप आए थे। उनसे पता चला था कि नीरा राडिया और बरखा दत्त जैसे लोग किस तरह सरकार को प्रभावित करते थे, लोगों के मंत्रालय तय करते थे और खबरें बनाते थे। मीडिया की शक्ति का दुरुपयोग करने वाली एक पूरी लॉबी थी, जो अटलजी की सरकार के समय लगातार उनकी आलोचना करती थी और सोनिया जी की सरकार के समय लगातार उनकी वंदना करती थी। भाजपा सरकारों को हमेशा उनका डर बना रहता था। मोदी सरकार ने उनके खिलाफ कभी सीधे-सीधे कुछ नहीं कहा। स्मृति ईरानी ने सूचना प्रसारण मंत्री रहते समय मीडिया को नियमों की याद दिलाने वाला एक सर्कुलर जारी किया था, उसे भी मोदी जी ने वापस करवा दिया। उसके लिए भी समर्थकों ने उनकी बहुत आलोचना की थी। लेकिन आज उस लॉबी का क्या हाल है? किसी जमाने में जो लोग सरकार में केबिनेट मंत्रियों के नाम तय करते थे, वे आज यूट्यूब पर वीडियो बनाकर गुजारा कर रहे हैं। दूसरी ओर जहाँ भाजपा सरकार के पक्ष में खुलकर बोलने वाला एकाध चैनल होता था, वहाँ आज देश का पूरा मीडिया ही दो अलग-अलग पक्षों में बँटकर आमने-सामने खड़ा हो गया है।

बॉलीवुड में आपने आखिरी बार किसी पाकिस्तानी गायक या कलाकार को कब देखा था? आए भी होंगे तो कब आए और कब गए किसी को पता भी नहीं चला। बड़े-बड़े खानों की फ़िल्में पिट रही हैं या वे अब फ़िल्में बनाने का साहस ही नहीं कर रहे हैं। बॉलीवुड भी खुलकर दो टुकड़ों में बंट गया है और वहां भी राष्ट्रवाद के नारे लगाने वाले अब बेझिझक आगे आ रहे हैं।

इन सब बातों को आप सही मानते हैं या गलत मानते हैं, ये अलग मुद्दा है। मैं उसमें नहीं पड़ना चाहता। लेकिन यह सब हो रहा है और ये मोदी-शाह की बिना कुछ बोले बहुत कुछ करने की कार्यशैली का ही परिणाम है, इसे आप नकार नहीं सकेंगे।

मैंने एक और बात यह भी देखी है कि जब भी सरकार विरोधी आन्दोलन या टकराव होता हुआ दिखाई देता है, तब अक्सर सरकार बहुत लंबे समय तक चुप रहती है और आक्रोश को बढ़ने देती है। एक तरफ आन्दोलनकारियों का धैर्य छूटता जाता है और दूसरी तरफ सरकार की निष्क्रियता के विरुद्ध आम जनता का आक्रोश बढ़ने लगता है। अंततः ऐसी स्थिति बन जाती है कि लोग खुद चिल्ला-चिल्लाकर मांग करने लगते हैं कि सरकार डंडे बरसाए और आन्दोलनकारियों को खदेड़े। उसके बाद ही सरकार आगे बढ़ती है और एक झटके में कार्यवाही करके आन्दोलन को पूरी तरह ठंडा कर देती है। आन्दोलनकारियों की कोई भी मांगें तो बिल्कुल नहीं मानी जातीं, उल्टा होने कानूनी तरीकों से इस तरह जकड़ा जाता है कि सांस लेना भी मुश्किल हो जाए। यह आप लोगों ने महाराष्ट्र में भीमा कोरेगांव वाली अराजकता के मामले में भी देखा होगा और पिछले वर्ष दिल्ली में शाहीन बाग़ वाले उपद्रव के मामले में भी देखा होगा। सरकार का यह तरीका सही है या गलत है, इस बारे में मैं कुछ नहीं कह रहा हूँ। लेकिन यह वास्तविकता है कि इस सरकार के काम करने का तरीका यही है और यह पैटर्न हमने कई घटनाओं में देखा भी है।

दिल्ली में पिछले कुछ दिनों से चल रहे आन्दोलन में भी यही पैटर्न देखने को मिला। पुलिस या अर्धसैनिक बलों को भेजकर घंटे भर में आन्दोलन का तंबू उखड़वा देना किसी सरकार के लिए कोई बड़ी बात नहीं होती है। लेकिन केन्द्र सरकार ने कई हफ़्तों तक आन्दोलन को खिंचने दिया और बातचीत के दौर जारी रखे। पिछली बार दिल्ली चुनाव के समय जब तमिलनाडु के हरे कपड़ों वाले किसान आकर दिल्ली में बैठ गए थे, तब भी सरकार ने उन्हें उठाया और बहुत दिनों तक आन्दोलन वैसे ही चलने दिया। शाहीन बाग के समय भी यही हुआ और इस बार भी यही हुआ था। यह भी लगभग तय था कि 26 जनवरी को आंदोलनकारी कुछ न कुछ हिंसक कृत्य करने वाले हैं क्योंकि यह बात उन लोगों ने स्वयं ही कैमरों पर आ आकर जोर शोर से कई बार दोहराई थी। ऐसा लगता है कि सरकार ने भी उन्हें सब करने दिया और अंततः किसान आन्दोलन का मुखौटा लगाकर घूम रहे अलगाववादियों और अराजकों का चेहरा खुलकर सामने आ गया और लोग ही कड़ी कार्यवाही का शोर मचाने लगे। जब यह सुनिश्चित हो गया कि आन्दोलन से लोगों की सहानुभूति पूरी तरह समाप्त हो चुकी है, उसके बाद ही सरकार ने कार्यवाही शुरू की।

मोदी सरकार का यह पैटर्न नया नहीं है। वह सही है या गलत है, इस पर आप अपनी राय बनाने को स्वतंत्र हैं, लेकिन यदि आप घटनाओं का निरीक्षण ध्यान से करेंगे, तो आपको सही निष्कर्षों पर पहुँचने में आसानी होगी।


(सभी चित्र गूगल से)

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