काश्मीर की कहानी (भाग-5)

(पिछला भाग यहाँ पढ़ें)

26 अक्टूबर 1947 को जम्मू-काश्मीर रियासत के महाराजा हरिसिंह ने विलय-पत्र पर हस्ताक्षर कर दिए और अपनी रियासत को भारत में मिलाने की सहमति दे दी। नेशनल कान्फ्रेंस और उसके नेता शेख अब्दुल्ला भी इस विलय के पक्ष में थे।

लेकिन माउंटबैटन और ब्रिटिश सरकार को यह बात पसंद नहीं थी। वे शुरू से प्रयास करते आ रहे थे कि काश्मीर या तो पाकिस्तान में मिल जाए या स्वतंत्र बना रहे। माउंटबैटन ही उस समय केबिनेट की रक्षा समिति के सभापति थे और भारत की सेना का कमांडर भी उस समय एक ब्रिटिश ऑफिसर ही था, इसलिए भारतीय सेना पर उनका पूरा नियंत्रण था।

इसका लाभ उठाकर वे लगातार इस बात के लिए प्रयास करते रहे कि भारत की सेना काश्मीर तक न पहुँच पाए। महाराजा हरिसिंह के अनुरोध को मानकर भारतीय केबिनेट ने सेना को उनकी सहायता करने का आदेश दिया था, जिसे नहीं माना गया। पाकिस्तान की सेना का कमांडर भी उस समय एक ब्रिटिश अधिकारी ही था। जब पाकिस्तान द्वारा प्रशिक्षित घुसपैठिये सशस्त्र आक्रमण के लिए काश्मीर में घुसे, उसके दो दिन पहले से ही पाकिस्तानी सेना के ब्रिटिश अधिकारियों की ओर से भारतीय सेना के ब्रिटिश अधिकारियों को इस बात की जानकारी दे दी गई थी, लेकिन फिर भी उन्होंने इसे रोकने के लिए कुछ नहीं किया।

जब महाराजा हरिसिंह ने भारत के विलय-पत्र पर हस्ताक्षर कर दिए और नेहरु सरकार ने श्रीनगर में भारतीय सेना भेजी, तो उसी दिन नेहरूजी को ब्रिटेन के प्रधानमंत्री एटली ने तार भेजा कि भारत और पाकिस्तान को युद्ध के बजाय बातचीत से विवाद सुलझाना चाहिए और भारतीय सेना को काश्मीर के मामले में दखल नहीं देना चाहिए।

पाकिस्तान के गवर्नर जनरल मोहम्मद अली जिन्ना ने भी तुरंत ही माउंटबैटन, नेहरु, हरिसिंह और जम्मू-काश्मीर रियासत के प्रधानमंत्री को बातचीत के लिए लाहौर आने का निमंत्रण भी भेज दिया। लेकिन भारत सरकार को यह मंजूर नहीं था कि काश्मीर को अभी भी त्रिपक्षीय विवाद माना जाए और भारत को पाकिस्तान के इस बयान से भी आपत्ति थी कि काश्मीर के विलय-पत्र पर धोखे से महाराजा से हस्ताक्षर करवाए गए हैं। इस कारण नेहरूजी ने पाकिस्तान जाने से मना कर दिया।

लेकिन फिर भी माउंटबैटन अकेले ही 1 नवंबर को जिन्ना से मिलने लाहौर गए। वहाँ पाकिस्तान से काश्मीर हमले के बारे में कोई जवाब माँगने के बजाय उन्होंने यह सुझाव दे डाला कि संयुक्त राष्ट्र की निगरानी में काश्मीर में जनमत-संग्रह करवाकर वहाँ के लोगों की राय ली जाए।

जिन्ना ने इस सुझाव को पूरी तरह अस्वीकार कर दिया।

माउंटबैटन फिर भी पाकिस्तान को लाभ पहुँचाने में लगे रहे। भारत लौटने पर उन्होंने नेहरूजी से मिलकर इस बात पर अप्रसन्नता जताई कि भारतीय सेना काश्मीर से पाकिस्तानी हमलावरों को बहुत आक्रामक रूप से लड़ रही है और हमलावरों को केवल रोकने की बजाय पूरे इलाके पर अधिकार जमाने के लिए आगे बढ़ती जा रही है।

अगले एक माह तक भारत सरकार और माउंटबैटन के बीच खींचतान चलती रही। केबिनेट लगातार आग्रह कर रही थी कि भारतीय सेना और आक्रामक होकर कार्रवाई करे व पाकिस्तानी हमलावरों को पूरे जम्मू-काश्मीर राज्य से बाहर खदेड़ा जाए। लेकिन अंग्रेज गवर्नर जनरल व सेना-प्रमुख इसमें आनाकानी कर रहे थे।

20 दिसंबर को भारत सरकार को इस बात की खबर लगी कि पाकिस्तानी सेना के ब्रिटिश कमांडर ने हमले से दो दिन पहले ही भारतीय सेना के ब्रिटिश कमांडर को इस बात की सूचना दे दी थी और फिर भी भारतीय सैन्य कमांडर ने न तो कोई एक्शन लिया और न भारत सरकार को जानकारी दी।

अब पानी सर से ऊपर निकल गया था।

20 दिसंबर को एक उच्च-स्तरीय बैठक बुलाई गई। उसमें नेहरूजी ने गवर्नर जनरल और सैन्य कमांडर से साफ़ कह दिया कि उनका यह कमजोर तरीका अब भारत सरकार को स्वीकार नहीं है। भारतीय सेना को तुरंत एक आक्रामक हमले की योजना बनानी चाहिए और काश्मीर को पूरी तरह अपने नियंत्रण में लेने के लिए तेजी से कार्यवाही करनी चाहिए।

अब माउंटबैटन को आशंका हुई कि पिछले कई महीनों से वे काश्मीर को भारत में मिलने से रोकने के लिए जो भी प्रयास कर रहे थे, वे सब विफल होने वाले हैं। इसलिए अब उन्होंने एक और दांव चला। उन्होंने नेहरूजी से आग्रह किया कि आक्रामक सैन्य कार्रवाई करने के बजाय भारत सरकार इस मुद्दे को संयुक्त राष्ट्र संघ में ले जाए और वहाँ इस पर चर्चा हो।

नेहरूजी इस बात से सहमत नहीं हो रहे थे। तब माउंटबैटन ने यह सुझाव दिया कि दोनों काम किए जाएँ; भारतीय सेना पाकिस्तान पर आक्रामक हमले की योजना भी बनाए और भारत सरकार काश्मीर के विवाद को संयुक्त राष्ट्र में भी उठाए। अब नेहरूजी ने उनकी यह बात मान ली।

लेकिन माउंटबैटन ने फिर एक बार भारत को धोखा ही दिया। भारत सरकार ने तो संयुक्त राष्ट्र में काश्मीर मुद्दे के बारे में शिकायत दर्ज करवा दी, लेकिन भारतीय सेना के ब्रिटिश कमांडर ने पाकिस्तान पर हमले की कोई योजना तैयार नहीं की। अगले कई महीनों तक नेहरूजी अपनी ही सेना के कमांडर और अपने ही गवर्नर जनरल से इस बात की शिकायतें करते रहे और वे दोनों लगातार बहाने बनाकर इस बात को टालते रहे।

उधर पाकिस्तानी सेना के ब्रिटिश कमांडर ने नवंबर 1947 में ही गिलगित के इलाके पर पाकिस्तानी झंडा फहराकर उस पर कब्जा कर लिया था। लद्दाख की भी शायद यही स्थिति हुई होती, लेकिन ब्रिगेडियर एल.के. सेन के नेतृत्व वाली 42 सैनिकों की टुकड़ी ने सैन्य मुख्यालय की स्वीकृति की प्रतीक्षा किए बिना बर्फीले तूफ़ान के बीच भी पैदल ही आगे बढ़कर जोज़ी ला की 5000 मीटर ऊँची चोटी पर अधिकार कर लिया और पाकिस्तानी सेना का लद्दाख में घुसने का रास्ता रोक दिया। अन्यथा गिलगित के समान ही लद्दाख भी शायद आज पाकिस्तान के नियंत्रण में होता।

पचास वर्षों बाद लन्दन के इण्डिया ऑफिस को जब पुराने दस्तावेज सार्वजनिक करने पड़े, तब एक और सत्य सामने आया कि उन दिनों युद्ध के दौरान जब भारत के सैनिक लद्दाख को पाकिस्तान से बचाने के लिए संघर्ष कर रहे थे, तब भारत के ब्रिटिश सैन्य कमांडर रॉय बचर उनकी सहायता के लिए कुछ करने के बजाय दरअसल लंदन में पाकिस्तानी सेना के ब्रिटिश सैन्य कमांडर के साथ मिलकर जम्मू-काश्मीर राज्य के बंटवारे का गुप्त-समझौता करने में व्यस्त थे।

1 जनवरी 1949 को जब दोनों सेनाओं के बीच युद्ध-विराम हुआ, तो जम्मू-काश्मीर राज्य लगभग उसी तरह विभाजित हो चुका था, जैसी सीमा-रेखा इन दोनों ब्रिटिश अधिकारियों ने तय की थी। आज तक भारत और पाकिस्तान की सेनाएँ उसी सीमा पर खड़ी हैं!

उधर संयुक्त राष्ट्र में भारत सरकार की शिकायत का क्या हुआ? उस बारे में अगले भाग में बात करेंगे।

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