काश्मीर की कहानी (भाग-4)

यह विडंबना है कि जिस अब्दुल्ला परिवार के शासन में 1989 में लाखों काश्मीरी पण्डितों को काश्मीर छोड़कर अपने ही देश में शरणार्थी बनना पड़ा, स्वयं उस अब्दुल्ला परिवार के पूर्वज भी कश्मीरी पण्डित ही थे। सन 1766 में एक सूफी मीर के प्रभाव में आने के बाद वे मुसलमान बने और दिसंबर 1905 में उसी परिवार में शेख अब्दुल्ला का जन्म में हुआ। उनके जन्म से दो माह पूर्व पिता की मृत्यु हो गई थी।

वह जुलाहों का एक गरीब परिवार था, लेकिन एक मुस्लिम धर्मगुरु ने अब्दुल्ला को पढ़ने के लिए प्रेरित किया और परिवार को मनाया कि इस बालक को भी पारिवारिक व्यवसाय में लगाने के बजाय उसकी शिक्षा की व्यवस्था की जाए। स्कूली पढ़ाई पूरी होने के बाद उन्हें श्रीनगर के प्रताप कॉलेज और फिर लाहौर के इस्लामिया कॉलेज भेजा गया। यहीं 1928 में पंजाब विश्वविद्यालय से उन्होंने अपनी बैचलर डिग्री पूरी की। इसके बाद पोस्ट-ग्रेजुएशन की पढ़ाई के लिए वे अलीगढ़ मुस्लिम विश्वविद्यालय चले गए और 1930 में वापस काश्मीर लौटे। उन्हें साठ रुपये मासिक वेतन पर मुजफ्फराबाद के शासकीय उच्च माध्यमिक विद्यालय में शिक्षक की नौकरी मिल गई। मुजफ्फराबाद अब पाकिस्तान के कब्जे वाले काश्मीर में है।

लेकिन अलीगढ़ मुस्लिम विद्यालय से एम. एससी. पढ़कर आए अब्दुल्ला को लगता था कि यह नौकरी उनके स्तर से बहुत छोटी है। उन्हें कोई बड़ा पद मिलना चाहिए। उन्होंने सिविल सर्विस की परीक्षा दी, लेकिन उसमें उनका चयन नहीं हुआ। शेख अब्दुल्ला को विश्वास था कि सिर्फ़ मुसलमान होने के कारण उनके साथ भेदभाव किया जा रहा है।

इसके विरोध में उन्होंने अपनी शिक्षक की नौकरी से इस्तीफा दे दिया।

उसी दौरान काश्मीर में जन-आन्दोलन भी तेजी से बढ़ रहा था। मुस्लिम रीडिंग रूम और फिर रीडिंग रूम पार्टी की स्थापना भी हुई थी। 1930 में ऑल काश्मीर मुस्लिम कान्फ्रेंस ने लाहौर में अधिवेशन किया और उसके बाद काश्मीर में सांप्रदायिक दंगे हुए। महाराजा के खिलाफ आंदोलन लगातार बढ़ता जा रहा था। इन सब बातों का वर्णन मैंने पिछले भाग में किया था।

नौकरी छोड़ने के बाद अब्दुल्ला अब पूरी तरह इस आंदोलन में शामिल हो गए। वे पहले से ही एक अच्छे वक्ता थे और अब आंदोलन के कारण उन्हें एक बड़ा मंच भी मिल गया था। जामा मस्जिद से उनके उत्तेजक भाषण सुनाई देने लगे।

सन 1931 में लंदन के गोलमेज सम्मेलन में महाराजा हरीसिंह ने काश्मीर की स्वतंत्रता की बात कह दी थी, जिसके बाद से अंग्रेज भी काश्मीर में उनके खिलाफ चल रहे आंदोलन को उकसा रहे थे। इस उद्देश्य को पूरा करने के लिए अंग्रेजों ने महाराजा के विरुद्ध स्थानीय लोगों को उकसाने में शेख अब्दुल्ला को प्रोत्साहन दिया। इस समर्थन की मदद से अब अपने आंदोलन को और आगे बढ़ाने के लिए शेख अब्दुल्ला ने मिर्जा मोहम्मद अफजल बेग और जी एम सादिक के साथ मिलकर मुस्लिम कान्फ्रेंस की स्थापना की।

पिछले भाग में मैंने 21 जून 1931 को श्रीनगर में हुई एक बड़े दंगे के बारे में भी लिखा था। इसी घटना में शेख अब्दुल्ला की गिरफ्तारी भी हुई थी। यह उनकी पहली जेल यात्रा थी, लेकिन आखिरी नहीं। जेल से छूटते ही उन्होंने फिर भड़काऊ भाषण देना शुरू कर दिया और 24 सितंबर को फिर से उन्हें गिरफ्तार कर लिया गया।

 धीरे-धीरे अब्दुल्ला को लगने लगा कि हिन्दुओं को साथ लिए बिना आंदोलन कभी सफल नहीं हो सकेगा। अक्टूबर 1932 में मुस्लिम कान्फ्रेंस के सम्मेलन में अब्दुल्ला ने प्रस्ताव रखा कि इसमें काश्मीरी हिन्दुओं को भी शामिल किया जाए। इस प्रस्ताव का इतना कड़ा विरोध हुआ कि मुस्लिम कान्फ्रेंस में फूट पड़ गई और एक गुट उससे अलग हो गया।

1931 में हुई हिंसा और गोलीबारी के बाद अंग्रेजों के दबाव में महाराजा को एक जाँच आयोग का गठन करना पड़ा था। एक अंग्रेज अधिकारी बी. जे. ग्लानसी उस आयोग के अध्यक्ष थे। मार्च 1932 में आयोग ने जाँच पूरी कर ली और अपनी सिफारिशें महाराजा को सौंप दीं। उसमें कहा गया था कि रियासत में फिर से मुसलमानों के लिए खुतबा और अज़ान पर लगी रोक हटाई जाए, किसी भी धर्म का अपमान करने पर कड़ी सजा का प्रावधान किया जाए, और शिक्षा व रोजगार में मुसलमानों को विशेष प्राथमिकता दी जाए। अप्रैल 1932 में महाराजा ने लगभग सभी मांगें मान लीं।

इसके अलावा ग्लानसी आयोग ने यह भी अनुशंसा की थी कि राज्य में एक विधानसभा का गठन किया जाए। इसका स्वरूप कैसा होगा और यह किस तरह काम करेगी, इस बारे में विचार करने के लिए एक और आयोग बनाया गया।

लेकिन अब्दुल्ला का कहना था कि यह आयोग बहुत सुस्ती से काम कर रहा है। इसलिए इसके विरोध में मार्च 1933 में शेख अब्दुल्ला ने असहयोग आंदोलन छेड़ दिया। उनकी माँग थी कि तुरंत ही रियासत में एक संवैधानिक सरकार का गठन किया जाए।

अंततः 1934 में आयोग ने महाराजा को सुझाव दिया कि मॉरले-मिंटो प्रस्ताव की तर्ज पर रियासत में भी एक सभा का गठन किया जाए। उसी के अनुसार अप्रैल 1934 में काश्मीर रियासत में प्रजा सभा का गठन हुआ। इसमें कुल 75 सदस्य होने थे, जिनमें से केवल 33 को चुनाव के द्वारा निर्वाचित किया जाना था। इन 33 में से 21 सीटें मुसलमानों के लिए, 10 हिन्दुओं के लिए और 2 सिक्खों के लिए आरक्षित थी। इस प्रकार 75 सदस्यीय प्रजा सभा में भी बहुमत महाराजा का ही रहने वाला था क्योंकि निर्वाचित सदस्यों की संख्या केवल 33 ही थी।

मतदान का अधिकार भी राज्य के सभी निवासियों के लिए नहीं था। महिलाओं और निरक्षरों को मतदान का अधिकार नहीं था। जिस व्यक्ति की वार्षिक आय कम से कम 400 रुपये हो, केवल वही चुनाव में मतदान कर सकता था।

संविधान की धारा 3 के द्वारा रियासत के सभी विषयों में निर्णय लेने का अधिकार केवल महाराजा को दे दिया गया था। धारा 30 में यह भी कहा गया था कि प्रजा सभा द्वारा पारित कोई भी प्रस्ताव महाराजा की स्वीकृति के बाद ही लागू होगा और महाराजा के निर्णय को कहीं चुनौती नहीं दी जा सकेगी। रियासत की सुरक्षा व्यवस्था और रियासत के संविधान से जुड़े सभी विषय भी प्रजा सभा के अधिकार क्षेत्र से बाहर थे। इस प्रकार प्रजा सभा के गठन के बाद भी वास्तव में इसके पास कोई शक्ति नहीं थी और सारे अधिकार अभी भी अकेले महाराजा के हाथों में ही थे।

शेख अब्दुल्ला को इसमें कोई संदेह नहीं था कि यह प्रजा सभा केवल दिखावटी है और इसके पास कोई शक्ति नहीं है। लेकिन उन्हें यह भी साबित करना था कि जन-समर्थन उनके साथ है। इसलिए उनकी पार्टी ने चुनाव लड़ा और मुस्लिमों के लिए आरक्षित 21 सीटों में से 19 पर उनकी जीत हुई।

प्रजा परिषद की पहली बैठक अक्टूबर 1934 में श्रीनगर में हुई। उन्हीं दिनों ब्रिटिश सरकार भी भारत के लिए संविधान बनाने के काम में लगी हुई थी, जो 1935 का भारत सरकार अधिनियम बना। उस माहौल को देखते हुए शेख अब्दुल्ला ने भी काश्मीर में जिम्मेदार सरकार लाने की माँग तेज कर दी।

रियासत की राजनीति में शेख अब्दुल्ला का प्रभाव लगातार बढ़ता जा रहा था और उनके राजनैतिक प्रतिद्वंद्वी तेजी से कमजोर होते जा रहे थे। उसी दौरान एक और घटना हुई, जिसका अब्दुल्ला को लाभ मिला। 

काश्मीर की सीमाएं रूस, अफगानिस्तान और चीन से मिलती थीं, इसलिए अंग्रेज हमेशा आशंकित रहते थे कि वहाँ से रूस भारत में घुसकर उनके साम्राज्य में सेंध न लगा दे। इसी कारण वे काश्मीर की आंतरिक राजनीति में भी बहुत दखल देते थे और महाराजा के कामकाज पर नियंत्रण रखने के लिए वे ब्रिटिश अधिकारियों को वहाँ नियुक्त करवाते थे। इससे छुटकारा पाने के लिए 1935 में महाराजा ने अंग्रेजों से समझौता कर लिया और गिलगित का सीमावर्ती इलाका साठ सालों की लीज पर पूरी तरह उनके हवाले कर दिया।

सीमावर्ती क्षेत्र का नियंत्रण अपने पास आ जाने पर अंग्रेजों ने काश्मीर की आंतरिक राजनीति से खुद को थोड़ा दूर कर लिया। उन्होंने रियासत के प्रधानमंत्री पद से अपने अंग्रेज अधिकारी कर्नल कॉलविन को भी हटा लिया और गोपालस्वामी अय्यंगर नए प्रधानमंत्री बने। उनके शासन में शेख अब्दुल्ला को अपनी राजनीति आगे बढ़ाने की थोड़ी और छूट मिल गई।

8 मई 1936 को मुस्लिम कान्फ्रेंस ने जिम्मेदार सरकार की माँग को लेकर रेस्पॉन्सिबल गवर्नमेंट डे मनाया। इसे सभी संप्रदायों और वर्गों के लोगों का भारी समर्थन मिला। उनकी पार्टी का भी लगातार विस्तार हो रहा था और गरीब व मजदूर वर्गों तक भी इसका प्रभाव बढ़ता जा रहा था, जिनमें सभी संप्रदायों के लोग थे।

प्रजा सभा का दूसरा चुनाव 1938 में होना था। उसी दौरान काश्मीर में एक नई पार्टी का भी गठन हुआ। उसका नाम हिन्दू प्रोग्रेसिव पार्टी था, लेकिन वह हिन्दू-मुस्लिम एकता की बात करती थी। संभवतः शेख अब्दुल्ला को यह चिंता हुई होगी कि रियासत में एक और पार्टी खड़ी हो गई, तो उनकी राजनीतिक शक्ति कमजोर हो जाएगी।

इसलिए उन्होंने फिर एक बार यह मुद्दा उछाला कि मुस्लिम कान्फ्रेंस के दरवाजे सबके लिए खोले जाएं। उन्होंने यह कहना भी शुरू कर दिया कि यदि हिन्दुओं और सिक्खों को मुस्लिम कान्फ्रेंस में शामिल होने की अनुमति नहीं दी गई, तो वे स्वयं ही मुस्लिम कान्फ्रेंस से अलग हो जाएंगे। उस समय तक काश्मीर की राजनीति में वे सबसे बड़े नेता बन चुके थे। 1938 तक उन्होंने पार्टी के भीतर अपने सभी प्रतिद्वंद्वियों को भी धीरे-धीरे बाहर कर दिया था और पूरी पार्टी उनके नियंत्रण में आ चुकी थी। इसलिए उनका विरोध करने वाला कोई नहीं बचा था। 

उसी वर्ष लाहौर में पहली बार नेहरू जी से उनकी मुलाकात हुई। नेहरू ने भी धर्मनिरपेक्ष राजनीति की ओर बढ़ने के शेख अब्दुल्ला के प्रयासों का समर्थन किया। उन दिनों नेहरू उत्तर पश्चिमी सीमा प्रांत के दौरे पर थे। शेख अब्दुल्ला भी इस पूरी यात्रा में उनके साथ रहे और यहीं से उन दोनों की दोस्ती की शुरुआत हुई।

अंततः जून 1938 में मुस्लिम कान्फ्रेंस ने यह प्रस्ताव पारित कर दिया कि यह पार्टी अब केवल मुसलमानों की नहीं है और किसी भी संप्रदाय का व्यक्ति इसकी सदस्यता ले सकता है। अगले वर्ष 1939 में मुस्लिम कान्फ्रेंस का नाम बदलकर ‘नेशनल कान्फ्रेंस’ कर दिया गया। यही आज के फारुख अब्दुल्ला और उमर अब्दुल्ला की नेशनल कान्फ्रेंस है।

1938-19 तक काश्मीर के विभिन्न राजनैतिक व सामाजिक संगठनों के बीच यह आपसी सहमति भी बनने लगी थी कि जम्मू-काश्मीर का स्वतंत्रता आंदोलन भारतीय स्वतंत्रता आंदोलन से अलग नहीं है और भारत की स्वतंत्रता के बाद जम्मू-काश्मीर रियासत को भी पूरी तरह भारत में मिल जाना चाहिए। मुस्लिम कान्फ्रेंस, काश्मीरी पण्डित युवक सभा, काँग्रेस और हिन्दू प्रोग्रेसिव पार्टी आदि सभी इस बात पर सहमत थे। उन्होंने यह प्रस्ताव भी पारित किया कि पूरा भारत एक है और जम्मू-काश्मीर रियासत इसका अभिन्न अंग है। इसी सहमति के कारण रियासत की हिन्दू पार्टियों और संगठनों ने भी शेख अब्दुल्ला के रेस्पॉन्सिबल गवर्नमेंट डे का पूरा समर्थन किया था।

मार्च 1940 में ऑल इण्डिया मुस्लिम लीग का अधिवेशन लाहौर में हुआ। वहीं मुस्लिम लीग ने मुसलमानों के लिए एक अलग देश बनाने की माँग करने वाला अपना प्रस्ताव पारित किया। इसी माँग के आधार पर आगे चलकर पाकिस्तान का जन्म हुआ था।

लेकिन इस प्रस्ताव पर समर्थन जुटाने के लिए मुस्लिम लीग को मुसलमानों की बहुसंख्या वाले सभी प्रांतों से समर्थन जुटाना था। यह उसके लिए बहुत कठिन साबित हो रहा था। सिंध, पंजाब, बंगाल और पश्चिमी सीमा-प्रांत में कहीं भी उसे पर्याप्त समर्थन नहीं मिला और जम्मू-काश्मीर में शेख अब्दुल्ला और उनकी पार्टी तो पूरी तरह से नेहरू-गाँधी की काँग्रेस के साथ खड़े हो चुके थे, जिसे मुस्लिम लीग अपना सबसे बड़ा विरोधी मानती थी।

मई-जून 1940 में नेहरू जी गर्मी की छुट्टियाँ बिताने काश्मीर गए और शेख अब्दुल्ला के मेहमान बने। वहाँ अब्दुल्ला के प्रति लोगों का अपार समर्थन देखकर उन्हें विश्वास हो गया था कि शेख अब्दुल्ला ही जम्मू-काश्मीर रियासत के सर्वमान्य नेता हैं। शेख अब्दुल्ला ने भी और अधिक मजबूती के साथ अपनी पार्टी को काँग्रेस की तरफ मोड़ लिया। 1942 में शेख अब्दुल्ला ने भी काँग्रेस के भारत छोड़ो आंदोलन का समर्थन किया। 

इन सारी बातों से नाराज जिन्ना की मुस्लिम लीग ने नेशनल कान्फ्रेंस में फूट डालकर गुलाम अब्बास के नेतृत्व वाले गुट को शेख अब्दुल्ला से अलग किया और पुरानी मुस्लिम कान्फ्रेंस को फिर खड़ा करने की कोशिश की, ताकि काश्मीर को पाकिस्तान में शामिल करवाने के उनके प्रयासों में सफलता मिल सके। लेकिन इसका कोई विशेष प्रभाव नहीं हुआ। शेख अब्दुल्ला अभी भी जम्मू-काश्मीर रियासत के सबसे बड़े और प्रभावी नेता बने रहे।

1944 में शेख अब्दुल्ला ने न्यू काश्मीर प्लान के नाम से जम्मू-काश्मीर के लिए एक नया संविधान प्रस्तावित किया। इसमें स्वतंत्रता, समानता, लोकतंत्र, महिलाओं को बराबरी के अधिकार आदि की बात कही गई थी। उसी वर्ष गर्मी की छुट्टी बिताने के बहाने जिन्ना भी काश्मीर आए और मुस्लिम कान्फ्रेंस के कार्यक्रमों में उन्होंने मुसलमानों से इस्लाम के नाम पर एकजुट होने और पाकिस्तान की माँग का समर्थन करने की अपील की। इसके जवाब में शेख अब्दुल्ला ने भी पूरे काश्मीर में जिन्ना के विरोध में सभाओं की झड़ी लगा दी और खुलकर भारत में शामिल होने की वकालत की। 

1945 में द्वितीय विश्व-युद्ध की समाप्ति के बाद भारत की राजनीति में भी तेजी से बदलाव हो रहा था। अंग्रेजों ने काँग्रेस के नेताओं को जेलों से रिहा कर दिया था और यह दिखने लगा था कि भारत की स्वतंत्रता अब ज्यादा दूर नहीं है। जून 1945 में वायसरॉय लॉर्ड वेवेल ने शिमला में काँग्रेस नेताओं को बैठक के लिए आमंत्रित किया ताकि भारत की स्वतंत्रता की योजना पर सहमति बनाई जा सके।

ऐसे माहौल में नेहरू और अब्दुल्ला भी यह दिखाने को उत्सुक थे कि उन दोनों की पार्टियों में बहुत गहरी दोस्ती है और दोनों पूरी तरह एक-दूसरे का सहयोग करेंगे। अगस्त में नेशनल कान्फ्रेंस ने अपना वार्षिक सम्मेलन आयोजित किया, जिसमें काँग्रेस के कई बड़े नेता भी सम्मिलित हुए। यहीं अपने भाषण में नेहरू ने शेख अब्दुल्ला को शेर-ए-काश्मीर कहा और लोगों से अपील की कि उन्हें बड़ी संख्या में नेशनल कान्फ्रेंस में शामिल होना चाहिए।

इन सब बातों से उत्साहित शेख अब्दुल्ला ने भी अंग्रेजों के जाने की संभावना को भांपते हुए महाराजा हरीसिंह के खिलाफ अपना आंदोलन और तेज कर दिया। 1942 के महात्मा गाँधी के भारत छोड़ो आंदोलन की तर्ज पर अब्दुल्ला ने 1946 में महाराजा के विरुद्ध काश्मीर छोड़ो आन्दोलन का नारा दिया। शेख अब्दुल्ला ने अब यहाँ तक कहना शुरू कर दिया कि काश्मीर रियासत पर डोगरा शासकों का कोई नैतिक अधिकार ही नहीं है क्योंकि यह रियासत कभी भी उनकी नहीं थी, बल्कि महाराजा गुलाब सिंह ने 1846 में अंग्रेजों से 75 लाख में सौदा करके काश्मीर रियासत पर कब्जा कर लिया था। उन्होंने लोगों से यह कहना भी शुरू कर दिया कि सारे काश्मीरियों को चन्दा इकट्ठा करके महाराजा हरि सिंह को 75 लाख रुपये लौटा देने चाहिए और उन्हें काश्मीर से बाहर कर दिया जाना चाहिए। इससे ज्यादा बर्दाश्त करना महाराजा के लिए संभव नहीं था। शेख अब्दुल्ला को गिरफ्तार कर लिया गया। उस समय अब्दुल्ला नेहरू से मिलने दिल्ली की ओर जा रहे थे।

इस गिरफ़्तारी के विरोध में नेहरू जी ने कई सार्वजनिक बयान जारी किए और लगातार महाराजा हरि सिंह की आलोचना की। पण्डित नेहरू स्वयं भी वकील थे। वे शेख अब्दुल्ला का केस लड़ने के इरादे से काश्मीर आए। लेकिन उन्हें भी गिरफ्तार कर लिया गया और बाद में श्रीनगर ले जाकर छोड़ दिया गया।

संभवतः अपनी इसी गिरफ़्तारी का बदला नेहरू जी ने बाद में लिया। आजादी के बाद जब आशंका होने लगी कि पाकिस्तान काश्मीर पर हमला कर सकता है, तो महाराजा हरि सिंह बार-बार भारत से सहायता का अनुरोध करते रहे और विलय-पत्र पर हस्ताक्षर करने के लिए उन्होंने सहमति भी जता दी लेकिन नेहरू जी काश्मीर के भारत में विलय को लगातार टालते रहे। अंततः जब अक्टूबर 1947 में पाकिस्तान ने सचमुच आक्रमण कर दिया और प्रधानमंत्री नेहरू जी फिर भी सहायता भेजने को राजी नहीं हुए, तब जाकर महाराजा और उनके प्रधानमंत्री को इसका असली कारण समझ आया।

नेहरू जी चाहते थे कि केवल विलय-पत्र पर हस्ताक्षर करना काफ़ी नहीं है, बल्कि महाराजा काश्मीर रियासत शेख अब्दुल्ला को सौंप दें और स्वयं वहाँ से बाहर चले जाएं। अंततः महाराजा को 30 अक्टूबर 1947 को शेख अब्दुल्ला को रियासत का आपातकालीन प्रशासक घोषित करना पड़ा। मार्च 1948 तक सत्ता पूरी तरह अब्दुल्ला के हाथों में आ गई और 1952 में महाराजा को हमेशा के लिए काश्मीर को छोड़कर चले जाना पड़ा। उसके बाद वे कभी अपनी रियासत में वापस नहीं लौट सके और 1961 में मुंबई में ही महाराजा हरि सिंह ने अंतिम साँस ली।

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