काश्मीर की कहानी (भाग-3)

आंग्ल-सिक्ख युद्ध के बाद हुई संधि के तहत अंग्रेज़ों ने 75 लाख रुपये के बदले डोगरा राजा गुलाब सिंह को जम्मू के साथ-साथ काश्मीर व लद्दाख के इलाके भी बेच दिए और इस प्रकार वर्तमान जम्मू-काश्मीर राज्य की सीमाएं बनीं। लेकिन इस संधि के बावजूद भी अंग्रेज़ों ने किसी न किसी बहाने राज्य के कामकाज में दखल देना भी जारी रखा।

काश्मीर के लोगों में शुरू से ही यह भावना थी कि डोगरा राजाओं को केवल जम्मू से लगाव है और वे केवल जम्मू के लोगों की चिंता करते हैं, जबकि काश्मीरियों के साथ मुसलमान होने के कारण भेदभाव किया जाता है। अंग्रेजों ने इस विवाद का पूरा लाभ उठाया और महाराजा की सहायता के नाम पर पहले उन्होंने राज्य में अपना एक रेसिडेंट अधिकारी नियुक्त करवाया। फिर एक पूरी काउंसिल ही नियुक्त कर दी। अब महाराजा का शासन केवल नाम का रह गया था।

1889 में अंग्रेज़ों ने काश्मीर के लिए एक नया संविधान बनवाया। इसके द्वारा दरबार में और सरकार के उच्च पदों पर ऐसे लोगों की नियुक्ति करवाई गई, जो डोगरा राजाओं से ज्यादा अंग्रेज़ों के प्रति निष्ठावान हों। इसके लिए एक बहुत सरल तरकीब अपनाई गई। अंग्रेज़ों ने नए संविधान के द्वारा फारसी को हटाकर उर्दू को रियासत की आधिकारिक भाषा बना दिया। राज्य के डोगरा और काश्मीरी पंडितों में यह भाषा जानने वाले लोग बहुत कम थे। दूसरा नियम यह बनाया गया कि उच्च पदों पर नियुक्ति के लिए स्नातक (ग्रेजुएट) होना आवश्यक है। काश्मीर में उस समय स्नातकों की संख्या भी न के बराबर थी। इसके बहाने अंग्रेजों ने पंजाब से अपने विश्वसनीय लोगों को लाकर सरकार में हर जगह नियुक्त करवा दिया।

लेकिन राज्य की नौकरियों में इस प्रकार बाहरी लोगों की तेजी से बढ़ती संख्या को देखते हुए राज्य में असंतोष भी भड़कने लगा था। इसे शांत करने के लिए सरकार ने यह नियम बनाया कि राज्य की नौकरियां केवल “मुल्की” अर्थात “राज्य के निवासियों” को ही मिलेंगी। लेकिन जो भी व्यक्ति रियासत में भूमि खरीद ले, वह निवासी होने का दावा कर सकता था। इसलिए एक और कानून यह बनाया गया कि बाहर के लोग जम्मू-काश्मीर रियासत में ज़मीन नहीं खरीद सकेंगे।

हिन्दुओं को सरकारी नौकरियों में फिर से हिस्सा पाने की चिंता थी और मुसलमानों को डोगरा शासकों से मुक्ति चाहिए थी। दोनों अपने-अपने स्तर पर इसके लिए प्रयास कर रहे थे और दूसरी तरफ केवल नाम के राजा रह गए महाराजा प्रताप सिंह अंग्रेज़ों से अपने अधिकार वापस पाने के लिए पत्राचार कर रहे थे। अंग्रेज हमेशा की तरह इन सारे झगड़ों और विवादों का पूरा लाभ उठा रहे थे। अंततः 1920 में अंग्रेज़ों ने महाराजा को थोड़ी राहत दे दी।

लेकिन रियासत की मुस्लिम प्रजा का असंतोष लगातार बढ़ता जा रहा था। सन 1924 में जब लॉर्ड रीडिंग काश्मीर की यात्रा पर गए, तो कुछ काश्मीरी मुसलमान अपनी मांगों को लेकर उनसे मिले। लेकिन वायसरॉय के जाते ही महाराजा का कहर टूटा और उन सबकी संपत्ति जब्त कर ली गई।

समानता और न्याय की माँग के साथ शुरू हुआ यह आन्दोलन धीरे-धीरे एक धार्मिक आन्दोलन बनने लगा। अलीगढ़ से उच्च शिक्षा लेकर लौटे मुस्लिम युवा रोज इन मुद्दों पर चर्चा के लिए इकट्ठा होने लगे और इस तरह श्रीनगर में ‘मुस्लिम रीडिंग रूम’ की शुरुआत हुई। आगे चलकर यह ‘रीडिंग रूम पार्टी’ बन गई।

इसी दौरान सन 1925 में महाराजा प्रताप सिंह की मृत्यु हो गई और उनके भतीजे महाराजा हरीसिंह रियासत के शासक नियुक्त हुए।

दिसंबर 1930 में ऑल काश्मीर मुस्लिम कान्फ्रेंस ने लाहौर में अपना वार्षिक सम्मेलन आयोजित किया था। वहाँ से वापस लौटे कुछ युवाओं ने जम्मू में एक नया आन्दोलन छेड़ दिया। इसे दबाने के लिए सरकार ने कई लोगों को गिरफ्तार करके जेल भेज दिया। कुछ मामलों में मुसलमानों की धार्मिक गतिविधियों में रोक-टोक करने की खबरें भी आईं। इसके परिणामस्वरूप ‘इस्लाम खतरे में!’ का नारा जम्मू की सड़कों पर गूंजने लगा और यहाँ से काश्मीर के विवाद ने पूरी तरह धार्मिक रंग ले लिया।

सन 1931 में दो बड़ी घटनाएं हुईं। भारतीयों की स्वराज की माँग पर चर्चा करने के लिए ब्रिटिश सरकार ने लंदन में एक गोलमेज परिषद का आयोजन किया था। जम्मू-काश्मीर रियासत के शासक होने के नाते महाराजा हरीसिंह भी वहाँ गए। वहाँ उन्होंने कह दिया कि ‘स्वतंत्रता हमारा अधिकार है।’ अंग्रेज़ सरकार इस बात से नाराज़ हो गईऔर अब उसने काश्मीर में महाराजा के विरोधियों को उकसाना और समर्थन देना प्रारंभ कर दिया ताकि महाराजा को पद से हटाया जा सके।

उसी वर्ष काश्मीर में एक और घटना हुई। श्रीनगर के एक यूरोपीय अधिकारी का पंजाबी खानसामा अब्दुल कादिर भाषणबाजी में भी माहिर था। उन दिनों अफवाह उठी थी कि एक पुलिसकर्मी ने कुरआन का अपमान किया है। इसके विरोध में 21 जून 1931 को आयोजित एक प्रदर्शन में अब्दुल कादिर ने भी भाषण दिया। उसने लोगों को उकसाया कि महाराजा के महल पर हमला करके उसे मिट्टी में मिला दिया जाए।

अब्दुल कादिर को रियासत की पुलिस ने गिरफ्तार कर लिया। लेकिन लोगों के आक्रोश को देखते हुए उसके मुकदमे की सुनवाई श्रीनगर की सेंट्रल जेल में करने का फैसला हुआ। 13 जुलाई 1931 को सुनवाई वाले दिन हजारों की भीड़ जेल के दरवाजे पर पहुँच गई। लोगों ने गेट तोड़ने का प्रयास किया, तो पुलिस ने उन्हें रोकने की कोशिश की। इसके जवाब में भीड़ ने पुलिस पर पथराव कर दिया। पुलिस ने गोलीबारी की। इक्कीस लोग मारे गए, कई लोग घायल हुए। इसका बदला लेने के लिए उस उन्मादी भीड़ ने श्रीनगर के बाज़ार में भारी उत्पात मचाया। दुकानों में तोड़-फोड़ और लूटपाट की गई, हिंदुओं पर हमले किए गए क्योंकि काश्मीर का राजा एक हिन्दू था।

13 जुलाई की इस घटना में पुलिस की गोलीबारी में मारे गए लोगों की याद में काश्मीरी मुसलमान इसे “काश्मीरी शहादत दिवस” के मनाने लगे। दूसरी ओर दंगों का शिकार हुए हिन्दुओं की याद में काश्मीरी हिन्दू इसे “काला दिन” कहने लगे। अंततः दिसंबर 2019 में इस पर रोक लगा दी गई।

शेख अब्दुल्ला की राजनीति भी इसी घटना के बाद से शुरू हुई थी।

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