कश्मीर की कहानी (भाग 1)

ईस्ट इण्डिया कंपनी की स्थापना सन 1600 में 31 दिसंबर को हुई थी। सन 1608 में कंपनी ने सूरत में अपना पहला व्यापारिक केन्द्र स्थापित किया और सन 1757 में प्लासी की लड़ाई के बाद भारत के कुछ इलाकों का शासन भी कंपनी के हाथों में आ गया और अगले सौ वर्षों तक चलता रहा। सन 1857 के स्वतंत्रता संग्राम से घबराई ब्रिटिश सरकार ने 1858 में ‘गवर्नमेंट ऑफ इण्डिया एक्ट’ नाम से एक नया कानून बनाया भारत का शासन कंपनी के हाथों से छीनकर सीधे अपने नियंत्रण में ले लिया। अब भारत में सरकार चलाने के लिए ब्रिटेन की ओर से एक गवर्नर जनरल नियुक्त किया जाता था, जो बाद में वायसरॉय कहा जाने लगा।

ईस्ट इण्डिया कंपनी ने भारत की रियासतों पर कब्जे के लिए कई तरीके अपनाए थे, जिनमें एक यह था कि यदि किसी रियासत के शासक की मौत हो जाए और उसका कोई पुत्र न हो, तो कंपनी सरकार उसके उत्तराधिकारी को मान्यता नहीं देगी और वह राज्य कंपनी का हो जाएगा। यह रियासतों में असंतोष का बड़ा कारण था।

सन 1858 में भारत का शासन अपने हाथों में लेने के बाद ब्रिटिश सरकार ने रियासतों को आश्वासन दिया कि अब इस नीति का उपयोग नहीं किया जाएगा और रियासतों को छीनने का ब्रिटेन का कोई इरादा नहीं है। लेकिन इस सुरक्षा के बदले रियासतों को ब्रिटिश सम्राट की सर्वोच्चता को स्वीकार करना पड़ता था, जिसका अर्थ यह था कि रियासतें ब्रिटिश ताज के प्रति वफादार रहेंगी और उनके विदेश, संचार और रक्षा विभाग ब्रिटिश शासन के अधीन रहेंगे। इसके अलावा ब्रिटिश सरकार रियासतों के आंतरिक कामकाज में ज्यादा दखल नहीं देती थी।

यह व्यवस्था 1947 में भारत की आजादी तक बनी रही।

(ब्रिटिश भारत)

तत्कालीन भारत का कुल क्षेत्रफल लगभग 16 लाख वर्ग मील था, जिसमें से लगभग सात लाख वर्ग मील का इलाका रियासतों के अधीन था और शेष भाग ब्रिटिश शासन के सीधे नियंत्रण में था। इन रियासतों की कुल संख्या लगभग 562 थी। जम्मू-काश्मीर की रियासत भी इनमें से एक थी।

जम्मू-काश्मीर का इलाका महाराजा रणजीत सिंह के सिख साम्राज्य का हिस्सा था। सन 1809 में जम्मू के गुलाब सिंह जमवाल रणजीत सिंह की सेना में शामिल हुए और उन्होंने सिख साम्राज्य के लिए कई लड़ाइयाँ भी जीतीं। सन 1822 में महाराजा रणजीत सिंह ने उन्हें जम्मू का प्रशासक नियुक्त किया।

सन 1839 में महाराजा रणजीत सिंह की मृत्यु हो गई और उनके उत्तराधिकारियों के बीच आपसी लड़ाई शुरू हो गई और इसके साथ ही सिख साम्राज्य का पतन भी शुरू हो गया था। सिख साम्राज्य कई टुकड़ों में बँट गया था। पटियाला और जींद जैसी रियासतों ने अंग्रेजों का साथ दिया और स्वाभाविक था कि सिखों की इस आपसी लड़ाई का सबसे ज्यादा फायदा अंग्रेजों को ही मिला। सन 1845 में अंग्रेजों और सिखों के बीच पहला युद्ध हुआ, जो ‘प्रथम आंग्ल-सिख युद्ध’ कहलाता है। इसमें सिखों की हार हुई और 1846 में अंग्रेजों और सिखों के बीच ‘अमृतसर की संधि’ हुई।

इतने बड़े इलाके को अकेले संभालना अंग्रेजों के बस की बात नहीं थी। इसलिए उन्होंने राजा गुलाब सिंह को ही जम्मू के शासक के रूप में मान्यता दे दी और इस प्रकार डोगरा राजवंश की स्थापना हुई, जिसने 1947 में इस रियासत का भारत में विलय होने तक वहाँ शासन किया। इसके अंतिम शासक महाराजा हरीसिंह थे।

द्वितीय विश्व युद्ध के बाद भारत पर शासन करना अंग्रेजों के लिए असंभव हो गया और 1947 में जब अंग्रेज भारत छोड़ने पर मजबूर हो गए, तो उसके साथ ही उन्होंने भारत विभाजन का इरादा भी घोषित कर दिया। इसके अनुसार पंजाब, बंगाल, बलूचिस्तान और उत्तर-पश्चिमी सीमा-प्रांत का मुस्लिम-बहुल इलाका भारत से अलग करके पाकिस्तान के नाम से एक नया देश बनाया जाना था।

इसी योजना के अनुसार जुलाई 1947 में ब्रिटेन की संसद ने ‘भारतीय स्वतंत्रता अधिनियम’ को पारित किया और 15 अगस्त 1947 को भारत में ब्रिटिश शासन का अंत हो गया। इसके साथ ही इन 562 रियासतों के साथ ब्रिटिश सरकार की जो संधि हुई थी, वह भी 15 अगस्त को समाप्त हो गई। इसका अर्थ यह था कि अब ये रियासतें भारत या पाकिस्तान में मिलने अथवा स्वतंत्र बने रहने का फैसला कर सकती थीं।

(ब्रिटिश भारत और रियासतें)

इनमें से अधिकांश रियासतें इतनी छोटी थीं और उनके पास संसाधन इतने कम थे कि स्वतंत्र देश के रूप में उनका अस्तित्व संभव ही नहीं था। उनमें से 14 रियासतें पाकिस्तान में शामिल हुईं। शेष लगभग 548 रियासतें भारत वाले हिस्से में थीं। सरदार पटेल की सूझबूझ के कारण उनमें से लगभग सभी रियासतों ने भारत में विलय की सहमति दे दी और वे रियासतें भारत में शामिल हो गईं। लेकिन हैदराबाद, जूनागढ़ और काश्मीर की तीन बड़ी रियासतें इसके लिए तैयार नहीं थीं। पहले ये तीनों स्वतंत्र रहना चाहते थे, लेकिन बाद में हैदराबाद और जूनागढ़ के नवाबों ने पाकिस्तान में शामिल होने की नीयत जताई। परिणामस्वरूप सरदार पटेल ने वहाँ सेना भेज दी और इन दोनों को भारत में शामिल होना पड़ा। जूनागढ़ के नवाब महाबत खान और दीवान शाह नवाज़ भुट्टो भागकर पाकिस्तान चले गए, लेकिन उनकी रियासत भारत में ही रह गई। इन्हीं शाह नवाज़ भुट्टो के बेटे ज़ुल्फिकार अली भुट्टो और पोती बेनज़ीर भुट्टो दोनों ही आगे चलकर पाकिस्तान के प्रधानमंत्री बने थे।

जम्मू-काश्मीर रियासत के महाराजा हरीसिंह अपनी रियासत को स्वतंत्र देश बनाना चाहते थे। इसलिए उन्होंने भारत और पाकिस्तान दोनों का ही प्रस्ताव स्वीकार नहीं किया था। लेकिन दो माह बाद ही अक्तूबर 1947 में कुछ ऐसी परिस्थितियाँ बनीं, जिसके बाद उन्होंने भारत में विलय के प्रस्ताव पर हस्ताक्षर कर दिए।

स्वतंत्रता के बाद लगभग 550 रियासतों का भारत में विलय हुआ था। विलय-पत्र पर हस्ताक्षर होने के बाद वे सभी हमेशा के लिए भारत का हिस्सा बन गए और उनमें से किसी भी रियासत को लेकर कभी कोई बड़ा विवाद नहीं हुआ। लेकिन क्या कारण है कि जम्मू-काश्मीर रियासत का विवाद समाप्त होने की बजाय बढ़ता ही रहा और इतने दशकों बाद आज तक भी जारी है? भारत में इतनी रियासतें थीं, लेकिन धारा 370 केवल काश्मीर के लिए ही क्यों जोड़ी गई? काश्मीर का इतना बड़ा हिस्सा पाकिस्तान के कब्जे में और फिर उसमें से कुछ हिस्सा चीन के नियंत्रण में कैसे चला गया? काश्मीर में आतंकवाद कब, कैसे और क्यों शुरू हुआ? 1948 में यह विवाद संयुक्त राष्ट्र संघ तक कैसे पहुँचा और तब से अब तक इतने दशक बीत जाने के बाद भी वहाँ जनमत संग्रह क्यों नहीं हुआ है? ऐसे कई सारे सवाल हैं, जिनके जवाब जानना काश्मीर समस्या के लिए आवश्यक हैं।

इसी कारण मैं आजकल 1947 से अब तक के काश्मीर के इतिहास के बारे में पढ़ रहा हूँ और अगले कुछ लेखों के माध्यम से उस पूरे घटनाक्रम की जानकारी आप लोगों तक भी पहुंचाऊँगा। मेरा इरादा केवल तथ्यों को जानने-समझने का है, इसलिए मैं आपको भी केवल तथ्य ही बताऊँगा और भारत-पाकिस्तान, भाजपा-काँग्रेस या जो भी अन्य पक्ष इस पूरे मामले से जुड़े हुए हैं, उनमें से कौन सही या कौन गलत है, इसका फैसला मैं आपको ही करने दूँगा।

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