इज़राइल-फ़िलिस्तीन संघर्ष (भाग-3)

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लेकिन इज़राइल को भी लगने लगा था कि सैन्य युद्ध में हमेशा उसकी जीत की कोई गारंटी नहीं है। इसलिए उसने भी बातचीत के दरवाजे खोलने शुरू कर दिए।

1978 में अमरीकी राष्ट्रपति के कैंप डेविड आवास में इज़राइल के प्रधानमंत्री मेनाचेम बेगिन और मिस्र के राष्ट्रपति अनवर सादात के बीच बारह दिनों तक गुप्त-वार्ता हुई और अंततः 1979 में दोनों देशों के बीच ऐतिहासिक शांति-समझौता हुआ। इज़राइल ने सिनाई प्रायद्वीप का पूरा क्षेत्र वापस मिस्र को सौंप दिया। मिस्र ने स्वेज नहर और तिरान की खाड़ी में इज़राइल के इज़राइल के जहाज़ों के अबाधित आवागमन की सहमति दी। मिस्र ने इज़राइल को एक देश के रूप में मान्यता भी दी और दोनों देशों ने अपने-अपने राजदूत भी नियुक्त किए।

इस ऐतिहासिक समझौते के लिए दोनों राष्ट्र प्रमुखों को इसके लिए संयुक्त रूप से उस वर्ष का नोबेल शांति पुरस्कार दिया गया। लेकिन संयुक्त राष्ट्र ने फ़िलिस्तीन के बारे में उनके समझौते को यह कहकर अस्वीकार कर दिया कि इसमें फ़िलिस्तीनी नेताओं से कोई बात नहीं की गई थी। अरब देशों ने भी इसे अपने साथ धोखा माना और मिस्र को अरब लीग से बाहर कर दिया गया। यह निष्कासन 10 वर्षों तक चला। सीरिया ने भी मिस्र के साथ अपने सारे संबंध तोड़ लिए, और 2005 के बाद ही उनके बीच स्थिति सामान्य हो पाई। 1981 में मिस्र के आतंकियों ने इज़राइल से समझौते की सज़ा के रूप में राष्ट्रपति अनवर सादात की हत्या कर दी।

दक्षिणी लेबनान से इज़राइल के विरुद्ध होने वाली पीएलओ की गतिविधियों के जवाब में 1982 में इज़राइल ने लेबनान पर हमला कर दिया। यह युद्ध 1985 तक चला और अंततः लेबनान से पीएलओ का पूरी तरह खात्मा हो गया।

दिसंबर 1987 से फ़िलिस्तीन में इज़राइल के खिलाफ पहले इंतिफादा (हिंसक विद्रोह) की शुरुआत हुई, जो 1991 की मेड्रिड कान्फ्रेंस तक चला। इस विद्रोह में फ़िलिस्तीनियों ने आतंकी हमलों, बहिष्कार, नागरिक असहयोग आदि सभी तरीकों से इज़राइल का विरोध किया। इस दौरान लगभग डेढ़ हजार फ़िलिस्तीनी और 422 इज़राइली मारे गए।

उसी वर्ष 1987 में ही अहमद यासीन और अब्दुल अज़ीज़ अल-रनतीसी ने मिलकर एक नए आतंकी संगठन ‘हरकत अल-मुक्वामा अल-इस्लामिया’ की स्थापना की, जिसे संक्षेप में ‘हमास’ कहा जाता है। इसने इज़राइल के खिलाफ सशस्त्र युद्ध को अपना लक्ष्य घोषित किया।

नवंबर 1988 में पीएलओ ने एक स्वतंत्र फ़िलिस्तीन राज्य की स्थापना की घोषणा कर दी। वास्तव में यह केवल एक कोरी घोषणा ही थी क्योंकि फ़िलिस्तीन का कोई स्वतंत्र अस्तित्व नहीं था और यह इलाका पूरी तरह इज़राइल के नियंत्रण में था। लेकिन इस घोषणा को इस रूप में देखा गया कि पीएलओ ने इज़राइल देश के अस्तित्व को मान लिया है और 1967 से पहले की सीमा को वह दोनों देशों की सीमा मानने को तैयार है। इसके बाद विश्व के कई देशों ने पीएलओ को फ़िलिस्तीनियों का एकमात्र प्रतिनिधि संगठन स्वीकार कर लिया और संयुक्त राष्ट्र ने भी इसे मान्यता दे दी।

1991 के खाड़ी युद्ध में जब ईराक ने कुवैत पर कब्जा कर लिया था, तो यासर अराफात ने इसे सही ठहराया और सद्दाम हुसैन का समर्थन किया। इससे नाराज़ होकर कुवैत ने 2 लाख फ़िलिस्तीनियों को वहाँ से बाहर भगा दिया। मिस्र और कई अन्य अरब देश इस युद्ध में ईराक के खिलाफ अमरीका का साथ दे रहे थे। वे भी अराफात से नाराज़ हो गए और उन्होंने पीएलओ की आर्थिक मदद बंद कर दी। इससे पीएलओ का अस्तित्व ही संकट में पड़ गया।

खाड़ी युद्ध की समाप्ति के बाद अमरीका, रूस, स्पेन, सीरिया, जॉर्डन, लेबनान आदि कई देशों ने मिलकर फिर एक बार इज़राइल और फ़िलिस्तीन के बीच समझौते के प्रयास आगे बढ़ाए। यूरोपीय संघ भी इसमें शामिल था। इस सम्मेलन में जल, पर्यावरण, सैन्य नियंत्रण, आर्थिक विकास एवं शरणार्थियों के विषय में चर्चा हुई और इज़राइल व फ़िलिस्तीन के बीच शांति स्थापना पर सहमति बनी।

इस सम्मेलन के बाद ही भारत और चीन ने इज़राइल को एक देश के रूप में मान्यता दी। ओमान, क़तर और कुछ अन्य अरब देशों ने भी इज़राइल को मान्यता दी।

जनवरी 1993 में नॉर्वे के ऑस्लो शहर में इज़राइल और फ़िलिस्तीन के बीच गुप्त-वार्ता का अगला दौर शुरू हुआ। सितंबर 1993 में यासर अराफ़ात ने इज़राइल के प्रधानमंत्री को पत्र लिखकर आधिकारिक रूप से इज़राइल के अस्तित्व को स्वीकार किया और हिंसा का मार्ग छोड़ने की घोषणा की। अगले ही सप्ताह वॉशिंगटन में अमरीकी राष्ट्रपति बिल क्लिंटन की उपस्थिति में यासर अराफात और इज़राइल के प्रधानमंत्री यित्जाक राबिन ने ऐतिहासिक ऑस्लो समझौते पर हस्ताक्षर किए।

यह ऑस्लो शांति प्रक्रिया 1993 से 2000 तक चलती रही। इसी के परिणामस्वरूप फ़िलिस्तीन में स्वायत्त सरकार की स्थापना हुई और उसे गाजापट्टी तथा वेस्ट बैंक में फ़िलिस्तीनी नागरिकों पर शासन का अधिकार मिला। फ़िलिस्तीनी पुलिस बल, संसद व अन्य प्रशासनिक विभागों की स्थापना भी हुई।

लेकिन इस शांति प्रक्रिया का इज़राइल में विरोध भी हुआ और 1995 में एक यहूदी संगठन ने ही इज़राइल के प्रधानमंत्री राबिन की हत्या कर दी। इसके बाद शिमोन पेरेस इज़राइल के प्रधानमंत्री बने और उन्होंने भी शांति प्रक्रिया जारी रखी।

इज़राइल की लिकुड पार्टी के नेता बेंजामिन नेतन्याहू ने इस शान्ति प्रक्रिया को लेकर कई सवाल उठाए और इसी कारण 1996 के चुनाव में उनकी पार्टी की जीत हुई। 1997 में प्रधानमंत्री नेतन्याहू ने फ़िलिस्तीनी प्रशासन के साथ एक समझौता किया, जिसके द्वारा फ़िलिस्तीन में फिर से इज़राइल सेना की तैनाती हुई और बदले में अधिकांश नागरिक विभाग फ़िलिस्तीनी प्रशासन को सौंप दिए गए।

1999 में एहुद बराक इज़राइल के प्रधानमंत्री बने और उन्होंने फिर से राबिन वाली शान्ति प्रक्रिया को आगे बढ़ाया। 1985 में लेबनान से युद्ध समाप्त होने के बाद भी इज़राइल की कुछ सेना दक्षिणी लेबनान में तैनात थी। उसे अब पूरी तरह हटा लिया गया।

जुलाई 2000 में अमरीका के कैंप डेविड में फिर एक बार बिल क्लिंटन, यासर अराफात और एहुद बराक के बीच बातचीत हुई। इज़राइल ने प्रस्ताव दिया कि वह फ़िलिस्तीन को पूरी गाजापट्टी सौंप देगा, फ़िलिस्तीन की राजधानी के लिए पूर्वी येरुशलम का एक हिस्सा देगा, वेस्ट बैंक का 73% हिस्सा तुरंत फ़िलिस्तीन को सौंप देगा और धीरे-धीरे इसे बढ़ाते हुए अगले 15-20 वर्षों में लगभग 95% वेस्ट बैंक फ़िलिस्तीन के हवाले कर देगा और फ़िलिस्तीन के शरणार्थियों के पुनर्वास के लिए बड़ी आर्थिक राशि भी देगा। लेकिन यासर अराफ़ात ने यह प्रस्ताव अस्वीकार कर दिया और बातचीत विफल हो गई।

यह बातचीत विफल होने के बाद सितंबर 2000 में दूसरे इंतिफादा की शुरुआत हुई, जो 2005 तक चला। फिर एक बार हिंसक और अहिंसक दोनों तरीकों से इज़राइल का विरोध शुरू हो गया। अधिकांश फ़िलिस्तीनी इसे एक विदेशी शक्ति के खिलाफ युद्ध मानते हैं, और अधिकांश इज़राइली इसे इज़राइल के खिलाफ आतंकी युद्ध मानते हैं।

वर्ष 2002 में बेरुत में अरब लीग का सम्मेलन हुआ। इसमें एक नया प्रस्ताव दिया गया, जिससे लगभग सभी अरब देशों ने इस बात पर सहमति बनी कि वे इज़राइल को मान्यता देंगे और उसके साथ संबंधों को सामान्य करेंगे। इसके बदले इज़राइल से मांग की गई कि वह गोलान की पहाड़ियों, गाजापट्टी और वेस्ट बैंक से अपनी सेना पूरी तरह हटा ले और इन क्षेत्रों का पूरा नियंत्रण हर तरह से फ़िलिस्तीन को सौंप दिया जाए। इज़राइल ने इस शर्त को मानने को इनकार कर दिया।

2003 के चुनाव में फिर एक बार अराइल शेरोन के नेतृत्व में लिकुड पार्टी की जीत हुई और फिर एक बार शांति वार्ता शुरू हुई। उसी वर्ष मार्च में यासर अराफ़ात ने महमूद अब्बास को फ़िलिस्तीन का प्रधानमंत्री घोषित किया, लेकिन वास्तव में सभी अधिकार अपने पास ही रखे। इससे अब्बास और अराफात के बीच टकराव की शुरुआत हुई और अंततः अक्टूबर में अब्बास ने प्रधानमंत्री पद से इस्तीफा दे दिया।

उसी वर्ष शेरोन ने गाजापट्टी में एकतरफा युद्ध विराम की घोषणा कर दी और इज़राइल की सेना को वहाँ से हटाने की प्रक्रिया शुरू कर दी। इसका फ़िलिस्तीनी पक्ष ने और इज़राइल के वामपंथियों ने समर्थन किया, लेकिन खुद शेरोन की ही लिकुड पार्टी और कुछ अन्य राष्ट्रवादी पार्टियों ने इसका विरोध किया।

नवंबर 2004 में यासर अराफात की मौत हो गई और महमूद अब्बास फ़िलिस्तीन के सर्वोच्च नेता बन गए। अराफात की मौत के बाद यह आरोप लगने लगे कि अराफात को विदेशों से अरबों डॉलर की आर्थिक सहायता मिलती थी, लेकिन उन्होंने फ़िलिस्तीनी लोगों के लिए कुछ करने की बजाय पूरा पैसा अपने निजी उपयोग में लगाया।

धीरे-धीरे ये आरोप बढ़ते गए और फ़िलिस्तीनी जनता पीएलओ से दूर होकर उसे प्रतिद्वंद्वी संगठन हमास के पक्ष में मुड़ने लगी। हमास ने खुलकर यह घोषणा की कि वह इज़राइल के अस्तित्व को स्वीकार नहीं करता, ऑस्लो शांति प्रक्रिया को सहमति नहीं देता और हिंसक हमलों के द्वारा इज़राइल को पूरी तरह नष्ट करना ही उसका लक्ष्य है।

2006 के फ़िलिस्तीनी प्रशासन के चुनाव में हमास की जीत हुई और उसे बहुमत मिला। इसके कारण अमरीका और कई यूरोपीय देशों ने फ़िलिस्तीन की आर्थिक सहायता बंद कर दी क्योंकि हमास एक आतंकी संगठन है और यह इज़राइल के अस्तित्व को नहीं मानता है।

2007 में हमास और फतह के विवाद के कारण फ़िलिस्तीनी प्रशासन दो गुटों में बँट गया। गाजापट्टी पर हमास का नियंत्रण हो गया और वेस्ट बैंक फतह के कब्जे में आ गया। उसके बाद से लगातार हमास और इज़राइल के लिए बीच युद्ध और आतंकी हमलों का खेल जारी है जो आज तक चल रहा है।

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