इज़राइल-फ़िलिस्तीन संघर्ष (भाग-2)

(पहला भाग यहाँ पढ़ें)

अगली ही सुबह 15 मई को अरब लीग के चार सदस्य देशों जॉर्डन, सीरिया, मिस्र और इराक की सेनाओं ने इज़राइल पर हमला बोल दिया। जल्दी ही लेबनान की कुछ सैन्य टुकड़ियाँ भी इसमें शामिल हो गईं और इस प्रकार अरब-यहूदी गृहयुद्ध अब अरब-इज़राइल युद्ध में बदल गया।

यह युद्ध लगभग दस माह तक चला और अंततः इसमें इज़राइल की जीत हुई। इस युद्ध में इज़राइल ने न केवल वह पूरी भूमि जीत ली जो संयुक्त राष्ट्र वाले प्रस्ताव में यहूदियों को दी गई थी, बल्कि जो भूमि अरबों को मिलनी थी, उसमें से भी 60% हिस्सा इज़राइल के नियंत्रण में आ गया। गाजापट्टी पर मिस्र ने और वेस्ट बैंक पर जॉर्डन कब्ज़ा कर लिया। पूर्वी येरुशलम जॉर्डन के और पश्चिमी येरुशलम इज़राइल के नियंत्रण में आ गया। इस युद्ध से लगभग सात लाख फ़िलिस्तीनी लोग विस्थापित हो गए और उन्होंने आस-पास के अरब देशों में शरण ली। दूसरी ओर लगभग साढ़े आठ लाख यहूदी भी उन देशों से भागकर इज़राइल आए। यहूदियों का यह पलायन 1972 तक चलता रहा।

मार्च 1949 में युद्ध समाप्त हो गया, लेकिन विवाद नहीं। मिस्र ने गाजापट्टी को आतंकियों के प्रशिक्षण का अड्डा बना लिया था और यहाँ से फ़िलिस्तीन के फिदायीन आतंकी इज़राइल को निशाना बनाते रहते थे। अगले 17-18 वर्षों तक दोनों ओर से हिंसक घटनाएँ और आतंकी हमले चलते रहे।

सऊदी अरब और मिस्र के बीच स्थित तिरान की खाड़ी इज़राइल के लिए अत्यंत महत्वपूर्ण समुद्री मार्ग था। 1950 में मिस्र ने तिरान की खाड़ी में इज़राइल के जहाज़ों के प्रवेश पर रोक लगा दी। जवाब में 1956 में इज़राइल ने मिस्र के सिनाई प्रायद्वीप पर हमला बोल दिया। अंततः संयुक्त राष्ट्र की मध्यस्थता से दोनों के बीच समझौता हुआ और इज़राइल को आश्वासन मिला कि मिस्र कभी भी तिरान की खाड़ी में इज़राइली जहाज़ों के आने-जाने पर प्रतिबंध नहीं लगाएगा। इस पर निगरानी के लिए वहाँ संयुक्त राष्ट्र की एक सैन्य टुकड़ी तैनात की गई। उसके बाद इज़राइल सिनाई प्रायद्वीप से पीछे हट गया।

जनवरी 1964 में मिस्र में अरब लीग का प्रथम सम्मेलन हुआ। उसमें यह तय हुआ कि फ़िलिस्तीनियों का प्रतिनिधित्व करने के लिए एक संगठन बनाया जाए। उसी के अनुसार मई 1964 में येरुशलम में ‘फ़िलिस्तीन नेशनल काउंसिल’ का गठन हुआ और फिर इसने सशस्त्र युद्ध के द्वारा फ़िलिस्तीन को आज़ादी दिलाने के उद्देश्य से जून 1964 में ‘मुनज्ज़मत अत-तहरीर अल-फ़िलस्तीनिया’ नामक एक नए संगठन की नींव रखी। इसी को हिन्दी में ‘फ़िलिस्तीन मुक्ति संगठन’ (पीएलओ) के नाम से जाना जाता है। दुनिया भर के 100 से अधिक देशों ने इसी संगठन को फ़िलिस्तीनी लोगों के एकमात्र अधिकृत प्रतिनिधि के रूप में मान्यता दी है।

1964 के बाद भी मिस्र और इज़राइल के संबंधों में गिरावट लगातार जारी रही। मई 1967 में मिस्र ने फिर एक बार तिरान की खाड़ी में इज़राइली जहाज़ों का प्रवेश रोक दिया, जिसके जवाब में 5 जून को इज़राइली वायुसेना ने मिस्र पर हमला करके उसकी लगभग पूरी वायुसेना नष्ट कर दी। उधर इज़राइल की ज़मीनी सेना ने गाजापट्टी और सिनाई प्रायद्वीप के इलाके भी जीत लिए।

मिस्र की मदद के लिए जॉर्डन ने इज़राइल पर हमला किया तो इज़राइल ने जॉर्डन के कब्जे वाले वेस्ट बैंक और पूर्वी येरुशलम को भी जीत लिया। इन सबके बीच मिस्र के बहकावे में आकर सीरिया ने भी इज़राइल पर हमला किया। जवाब में इज़राइल ने सीरिया की गोलान पहाड़ियों को जीत लिया। अंततः मिस्र, जॉर्डन और सीरिया तीनों ने घुटने टेक दिए और इज़राइल से शान्ति समझौता कर लिया। केवल छः दिनों में ही इज़राइल ने एक साथ इन सारे अरब देशों को धूल चटा दी थी, इसलिए इसे छः दिवसीय युद्ध के नाम से जाना जाता है।

सितंबर 1967 में सूडान में अरब सम्मेलन हुआ, जिसमें आठ अरब देशों ने इज़राइल के खिलाफ ‘तीन नकार’ वाला एक प्रस्ताव पारित किया, जिसमें सहमति बनी कि कोई भी अरब देश 1) इज़राइल से शान्ति समझौता नहीं करेगा, 2) इज़राइल को मान्यता नहीं देगा और 3) इज़राइल से कोई वार्ता नहीं करेगा।

लेकिन छः दिवसीय युद्ध में अरब देशों की करारी हार के बाद उनसे फ़िलिस्तीनी संगठनों का विश्वास उठ गया। 1969 में मिस्र के काइरो में फ़िलिस्तीन नेशनल काउंसिल का चुनाव हुआ, जिसमें फतह गुट के नेता यासर अराफ़ात की जीत हुई और वे पीएलओ के चेयरमैन बन गए। फतह एक हिंसक आतंकी संगठन था, जो शुरू से ही इज़राइल के खिलाफ़ सशस्त्र हमले करता रहा था।

अब यासर अराफ़ात की जीत के बाद पीएलओ ने वेस्ट बैंक पर कब्जे की लड़ाई शुरू की, लेकिन इज़राइल ने उन सबको जॉर्डन में खदेड़ दिया। जॉर्डन की जनसंख्या में लगभग 70% फ़िलिस्तीनी हो चुके थे। अब उन्होंने जॉर्डन के खिलाफ भी लड़ाई छेड़ दी और वहीं से बार-बार इज़राइल पर भी हमले करते रहे।

उसी बीच फ़िलिस्तीनी आतंकी दक्षिणी लेबनान में घुसकर वहाँ से भी इज़राइल पर हमले करते रहते थे। धीरे-धीरे उनकी शक्ति इतनी ज्यादा बढ़ गई कि दक्षिणी लेबनान पर पूरी तरह उनका ही कब्जा हो गया और लेबनान की सेना को ही हार मानकर फ़िलिस्तीनियों से संधि करनी पड़ी।

लेकिन 1970 के अंत तक इधर जॉर्डन का पलड़ा भारी हो गया था और अंततः जुलाई 1971 में उसने फ़िलिस्तीनियों को जॉर्डन से पूरी तरह खदेड़ दिया। उन सबने भागकर लेबनान में शरण ली, जिसके कारण पीएलओ और लेबनान के स्थानीय ईसाइयों के बीच संघर्ष की शुरुआत हो गई और अप्रैल 1975 से लेबनान में गृहयुद्ध छिड़ गया, जो 1990 तक चला। इसमें लगभग डेढ़ लाख लोग मारे गए और लगभग दस लाख लोग विस्थापित हो गए। फ़िलिस्तीनियों का सहयोग करने में लेबनीज़ नेशनल मूवमेंट जैसी वामपंथी पार्टियों और सोवियत रूस की बड़ी भूमिका थी।

1970 से ही पीएलओ ने इज़राइल के आम नागरिकों पर भी हमले जारी रखे। कई स्कूलों, बसों, हवाई अड्डों और अन्य सार्वजनिक स्थलों पर बम विस्फोट जैसी घटनाएँ लगातार होती रहीं। यहाँ तक कि लंदन, पेरिस और यूरोप के कई अन्य शहरों में भी फ़िलिस्तीनी आतंकियों ने इज़राइलियों पर हिंसक हमले किए। 1972 में म्यूनिख (जर्मनी) के ग्रीष्म ओलंपिक में फ़िलिस्तीनी आतंकियों ने इज़राइल की टीम को बंधक बना लिया, जिसके बाद हुए संघर्ष में इज़राइल के सभी 11 खिलाड़ी और कोच मारे गए। 1974 में फ़िलिस्तीनी आतंकियों ने मालोट में एक स्कूल पर हमला किया, जिसमें 22 बच्चों की जान चली गई। बदले में इज़राइल की सेना और ख़ुफ़िया संगठन भी लगातार फ़िलिस्तीनियों पर हमले करते रहे।

अक्टूबर 1973 में सीरिया और मिस्र की सेनाओं ने मिलकर अचानक इज़राइल के उत्तर में गोलान की पहाड़ियों और दक्षिण में सिनाई प्रायद्वीप पर हमला कर दिया। यह रमज़ान के महीने का अंतिम दिन था और वही यहूदियों के सबसे पवित्र त्यौहार ‘योम किप्पूर’ का दिन भी था। उसी के नाम पर यह युद्ध ‘योम किप्पूर युद्ध’ कहलाया। यह युद्ध केवल उन्नीस दिन चला, लेकिन फिर एक बार इज़राइल ने दोनों अरब देशों को धूल चटा दी और उनकी हजारों वर्ग किमी की भूमि को जीत लिया।

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