अफ़ग़ानिस्तान में अस्थिरता की कहानी (भाग-३)

पिछले भाग में मैंने आपको बताया था कि 27 अप्रैल 1978 के दिन अफ़गानिस्तान में वामपंथियों ने दाऊद खान का तख्तापलट कर दिया और देश की सत्ता अपने कब्जे में ले ली। यह घटना सॉर (अप्रैल) क्रांति कहलाती है। लेकिन यह रातोंरात नहीं हुआ था। इसकी तैयारी बहुत समय से चल रही थी और उसमें कई लोगों की भूमिका थी।

पिछले भाग में मैंने आपको अफ़गानिस्तान की वामपंथी राजनैतिक पार्टी पीडीपीए के ‘खल्क’ और ‘परचम’ गुटों के बारे में भी बताया था, जिनमें आपसी खींचतान और संघर्ष चलता रहता था। 

जुलाई 1977 आते-आते ये दोनों गुट समझने लगे थे कि अकेले-अकेले लड़कर ये दाऊद खान से मुकाबला नहीं कर सकेंगे। अंततः दोनों गुटों के नेताओं ने आपस में समझौता कर लिया। इसे करवाने में सोवियत रूस के साथ-साथ ही ईरान और भारत के वामपंथी दलों की भी बड़ी सक्रिय भूमिका थी।

इस समझौते के बाद पीडीपीए की एक नई सेंट्रल कमिटी का गठन हुआ, जिसमें दोनों गुटों के 15-15 सदस्य थे। लेकिन अफ़गान सेना में ये दोनों गुट अभी-अभी अलग-अलग ही चलते रहे और एक-दूसरे से प्रतिस्पर्धा करते रहे। दाऊद खान ने अपने शासन-काल में सेना से परचम गुट के कई अधिकारियों को हटा दिया था अथवा उनकी तैनाती काबुल से बहुत दूर-दूर के इलाकों में करवा दी थी। कुछ को सेना से हटाकर अन्य सरकारी विभागों में भेज दिया था। जिनसे ज़्यादा खतरा लगा, उन्हें किसी न किसी बहाने गिरफ्तार करवा दिया था।

खल्क गुट के नेता हाफ़िजुल्ला अमीन ने परचम गुट के खिलाफ दाऊद खान की इस कार्यवाही का पूरा फायदा उठाया और सेना में अपने लोगों को भर्ती करवाने के लिए सक्रिय अभियान चलाया। इसी अभियान की सफलता के आधार पर बाद में एक बार अमीन ने यह रहस्योदघाटन भी किया था कि तख्तापलट के लिए खल्क गुट की तैयारी तो 1976 में ही पूरी हो चुकी थी।

चूँकि अफ़गानिस्तान बहुत लंबे समय से ही अपनी सेना के टैंक, हथियारों और अन्य उपकरणों के लिए सोवियत संघ पर निर्भर रहता था, इसलिए इन सबको चलाने का प्रशिक्षण देने के लिए भी अफ़गान सेना में बड़ी संख्या में रूसी या उनके द्वारा प्रशिक्षित लोग शामिल करवाए जा चुके थे। 1978 तक आते-आते तो यह स्थिति बन गई थी कि अफ़गान नौकरशाही में अधिकांश पेशेवर और तकनीकी पदों पर रूसी मोहरे तैनात हो चुके थे तथा थल-सेना और वायुसेना में लगभग एक तिहाई अफ़सर रूसी प्रभाव वाले थे।

इस पूरी तैयारी के बाद 27 अप्रैल 1978 को सोवियत रूस की शह पर अफ़गान पीडीपीए ने सेना के मिलकर दाऊद खान का तख्ता पलट दिया। उसी दिन रेडियो से घोषणा कर दी गई कि अफ़गानियों के हितों की रक्षा के लिए एक सैन्य समिति ने सत्ता की बागडोर अपने हाथों में ले ली है। 

दो दिन बाद ही अगली घोषणा में बताया गया कि अब ‘अफ़गान जनवादी लोकतांत्रिक गणराज्य’ (People’s Democratic Republic of Afghanistan) की स्थापना हो चुकी है और देश को सही राह पर आगे ले जाने के लिए एक रिवॉल्यूशनरी काउंसिल का गठन कर दिया गया था। इस काउंसिल में मूलतः पीडीपीए की सेंट्रल कमिटी के सदस्य और सेना के कुछ अधिकारी शामिल थे।

अगले दिन इस काउंसिल ने एक केबिनेट का गठन किया। नूर मोहम्मद तराकी को इसका अध्यक्ष और देश का नया प्रधानमंत्री नियुक्त किया गया। बाबराक करमल, हाफ़िजुल्ला अमीन और मुहम्मद असलम वतनजर को उपप्रधानमंत्री बनाया गया। अमीन-समर्थक वतनजर सेना के अफ़सर थे और सॉर क्रांति में सरकार के खिलाफ़ सैन्य कार्यवाही उन्हीं के नेतृत्व में की गई थी।

एक माह के भीतर ही इस रिवॉल्यूशनरी काउंसिल का स्थान एक पॉलिट ब्यूरो ने ले लिया और आधिकारिक रूप से अफ़गानिस्तान में वामपंथी शासन की शुरुआत हो गई।

नूर मुहम्मद तराकी का जन्म 1917 में ग़ज़नी के एक गरीब परिवार में हुआ था। उनकी शिक्षा-दीक्षा भी बड़ी साधारण रही। किसी तरह उन्हें कंधार की एक नामी एक्सपोर्ट कंपनी में नौकरी मिल गई। यह कंपनी फलों का निर्यात करती थी। इस नौकरी के तहत 1932 में तराकी को पाँच-वर्षों के लिए मुंबई भेजा गया। वहीं रहने के दौरान उन्होंने अंग्रेज़ी सीखी। इसी दौर में वे भारत के वामपंथियों के संपर्क में भी आए और यहीं से उनकी वामपंथी गतिविधियों की शुरुआत हुई।

पाँच वर्ष बाद अफ़गानिस्तान वापस लौटने पर तराकी ने वहाँ के प्रशासकीय कॉलेज में आगे की पढ़ाई की और कई सरकारी विभागों में काम किया। वे रेडियो काबुल और सरकारी समाचार एजेंसी में भी रहे। बाद में उन्हें अमरीका के अफ़गान दूतावास में प्रेस अताशे बनाकर वॉशिंगटन भी भेजा गया। आगे दाऊद सरकार ने जब उन्हें उस पद से हटाकर वापस अफ़गानिस्तान आने का आदेश दिया, तो उन्होंने अफ़गान सरकार की सार्वजनिक आलोचना की और अमरीकी सरकार से शरण मांगी। लेकिन अमरीका ने उनका अनुरोध ठुकरा दिया। अब तराकी ने दाऊद खान से माफ़ी मांग ली और वापस अफ़गानिस्तान लौट गए। उन्हें माफ़ करना शायद दाऊद खान की सबसे बड़ी भूल थी।

1940 के दशक से ही तराकी वामपंथी आंदोलन में सक्रिय हो चुके थे। उन्होंने वामपंथी आंदोलन का महिमामंडन करने वाली कई कहानियाँ और कुछ उपन्यास भी लिखे। लेकिन लेखक के रूप में उन्हें कभी बड़ी पहचान नहीं मिली। उन्होंने अनुवाद एजेंसी भी शुरू की थी, वह भी कुछ खास सफल नहीं रही थी। लेकिन फिर भी 1960 के दशक में तराकी सोवियत संघ की यात्रा पर गए और यहीं से लोगों में यह संदेह शुरू हुआ कि शायद यह व्यक्ति वास्तव में सोवियत एजेंट है। वहीं से लौटने के बाद 1965 में तराकी ने पीपल्स डेमोक्रेटिक पार्टी ऑफ़ अफ़गानिस्तान (पीडीपीए) की स्थापना की थी। 1978 में तख्तापलट के बाद देश के प्रधानमंत्री बनने तक तराकी ही पीडीपीए और इसके खल्क गुट के नेता बने रहे।

जुलाई 1978 तक अमीन अकेले ही उप-प्रधानमंत्री बचे थे। विरोधियों की जासूसी करने और उन्हें ठिकाने लगाने के लिए एक नई सीक्रेट पुलिस एजेंसी (एजीएसए) का गठन भी हुआ था, जिसके मुखिया भी अमीन ही थे। पॉलिट ब्यूरो से करमल और उनके समर्थकों को बाहर करने के लिए उन्हें अलग-अलग देशों में राजदूत बनाकर भेजने का आदेश जारी कर दिया गया। अमीन स्वयं ही विदेश-मंत्री भी थे, इसलिए राजदूत बनने के कारण ये सभी लोग अब अमीन के सीधे नियंत्रण में आ जाते। इस तरह करमल की शक्ति खत्म करने के साथ-साथ ही अमीन ने उन पर उनके खास समर्थकों पर निगरानी रखने की भी चौकस व्यवस्था कर ली थी। इन्हीं में मुहम्मद नजीबुल्लाह भी एक थे, जो आगे चलकर अफ़गानिस्तान के प्रधानमंत्री बने।

देश छोड़ने से पहले करमल ने तराकी और अमीन के खिलाफ एक और विद्रोह का प्रयास किया। यह विफल हो गया, लेकिन इसके बहाने अमीन ने एजीएसए के हाथों परचम गुट के सैकड़ों लोगों को गिरफ़्तार कर लिया। लगभग पाँच सौ लोगों को फांसी पर लटका दिया गया। करमल और नजीबुल्लाह भागकर प्राग और फिर मास्को चले गए। 

इन सारी गतिविधियों और तख्ता पलट के बारे में अफ़गानिस्तान के अधिकतर लोगों ने कोई ध्यान नहीं दिया था। अफ़गानिस्तान का समाज हजारों गांवों और कबीलों में बँटा हुआ था और इनमें से अधिकांश लगभग स्वतंत्र थे और अपने-अपने ढंग से अपनी परंपराओं के अनुसार शासन चलाते थे। लोगों की निष्ठा भी अपने-अपने कबीलों तक सीमित थी।

लेकिन वामपंथी सरकार ने कई ऐसे निर्णय लिए जिनसे इन कबीलों की हजारों वर्षों से चली आ रही परंपराओं और उनकी सामाजिक व्यवस्था को आघात पहुँचने लगा। इसके बाद ही सरकार के खिलाफ लोग एकजुट होना शुरू हुए।

इनमें से एक सरकारी आदेश कर्ज और सूदखोरी के खिलाफ था। सरकार ने आदेश जारी कर दिया कि जमींदारों और महाजनों को छोटे कर्जदारों का पूरा कर्जा माफ़ करना होगा और नए ऋण देते समय बहुत ऊँची दरों पर ब्याज नहीं वसूला जा सकता। इससे नाराज होकर अधिकांश जमींदारों ने नए कर्ज देने से ही साफ मना कर दिया। छोटे किसानों को कर्ज नहीं मिल पाने से वे फसल ही नहीं उगा पाए और पूरी अर्थव्यवस्था चौपट हो गई।

एक और आदेश यह आया कि कोई भी व्यक्ति 14 एकड़ से ज्यादा ज़मीन का मालिक नहीं हो सकता। अतिरिक्त भूमि को सरकारी कब्जे में लेकर भूमिहीनों में बाँटा जाएगा। ऐसे ज्यादातर बड़े जमींदार ही उन गाँवों के धार्मिक नेता भी थे। अपनी ज़मीनें छिनती देखकर उन्होंने लोगों को भड़काना शुरू कर दिया कि यह सरकार इस्लाम-विरोधी है। एक और पहलू यह भी था कि अधिकांश ज़मीनें ताकतवर कबीलों के कब्जे में थी। जब उनसे छीनकर ये ज़मीनें दूसरे कबीलों के लोगों में बाँटी जाने लगी तो सामाजिक संघर्ष और भड़क गया। कई जगह पर ज़मीनें मुखिया के नाम पर होती थीं, लेकिन पूरे कबीले के लोगों की उसमें हिस्सेदारी थी। सरकार ने जब ज़मीनों पर कब्जा करके दूसरों में बाँटना चालू कर दिया, तो कई लोगों का हक छिन गया। इससे भी असंतोष भड़का। 

सरकार ने एक साक्षरता अभियान चलाया। वह भी उसकी एक भयंकर भूल साबित हुई। इस साक्षरता अभियान के तहत ग्रामीणों को साक्षर बनाने के लिए काबुल विश्वविद्यालय के छात्रों को दूरदराज के गाँव-गाँव तक भेजा गया। गाँवों और कबीलों की परंपराओं से अनजान और अपनी विद्वत्ता व आधुनिकता के घमंड से भरे ये वामपंथी छात्र जब गाँवों में पहुँचे, तो लोगों ने इन बदमिजाज छात्रों का भारी विरोध किया। अधिकतर ग्रामीण वयस्कों के लिए आधुनिक शिक्षा वैसे भी शायद किसी काम की नहीं थी और न कक्षाओं में बैठकर लिखने-पढ़ने में उनकी कोई रुचि थी। ऊपर से शहर के छोकरे आकर हमें ज्ञान सिखाएंगे, इस बात की नाराज़गी अलग थी। इसके अलावा लोग इस बात से भी बहुत नाराज़ थे कि पुरुष और महिलाएं सब एक ही कमरे में एक साथ बैठकर पढ़ेंगे और कॉलेज के युवा लड़के ही गाँव की महिलाओं को भी पढ़ाएंगे। यह सीधे-सीधे उनकी सामाजिक परंपराओं पर आघात था। शायद इतना भी काफी नहीं था, इसलिए सरकार ने इस साक्षरता कार्यक्रम में रूसी भाषा पढ़ना भी अनिवार्य कर दिया था। इससे लोगों का बचा-खुचा धैर्य भी जवाब दे गया क्योंकि रूसी तो काफ़िरों की भाषा थी!

एक और सरकारी आदेश दहेज प्रथा से संबंधित था। लेकिन अफ़गानिस्तान में दहेज-प्रथा भारत जैसी नहीं थी, बल्कि वहाँ शादी के लिए लड़के के परिवार वालों को लड़की के परिवार को धन देना पड़ता था। ग्रामीण परंपराओं से अनजान रूसियों और वामपंथियों ने इसे लड़कियों को खरीदने-बेचने वाली प्रथा कहकर बंद करवा दिया। लेकिन वास्तव में यह धन तलाक की स्थिति में महिलाओं की आर्थिक सुरक्षा की गारंटी थी। अगर किसी महिला को उसका पति तलाक दे दे, तो इस धन की बदौलत वह तलाक के बाद भी ठीक से अपना गुजारा चला पाती थी। किसी भी महिला से विवाह करने के लिए पुरुष को बड़ी रकम जमा करनी पड़ती थी, इसलिए तलाक की घटनाएं भी बहुत कम होती थीं और केवल बहुत अमीर लोगों के अलावा कोई पुरुष एक से ज्यादा पत्नियाँ भी नहीं रख सकता था। इस प्रथा को बंद करने के सरकारी आदेश ने यह पूरी सामाजिक व्यवस्था और उसके बहाने महिलाओं को मिलने वाली आर्थिक सुरक्षा भी खत्म कर दी।

वामपंथी सरकार ने शहरों में भी लोगों पर भारी अत्याचार किए। पिछली सरकारों में या राजा ज़हीर शाह के दौर में जो भी लोग उच्च पदों पर रहे थे, उन सबको चुन-चुनकर पकड़ा गया और प्रताड़ित किया गया। कई प्रोफ़ेसर, उद्योगपति, व्यापारी और बड़े सरकारी अधिकारी देश छोड़कर चले गए। उनकी प्रताड़ना या पलायन का यह क्रम अगले 24 वर्षों तक लगातार चलता रहा और इस दौरान ऐसे लगभग 1 लाख प्रतिभाशाली लोगों ने अफ़गानिस्तान को छोड़कर दूसरे देशों में शरण ली।

ऐसी कई बातों के कारण पूरे देश में सरकार-विरोधी भावनाएं भड़कने लगीं और एक-एक करके कई उग्रवादी गुट भी खड़े होते गए। कर्ज न मिलने से फसल चौपट हो जाने के कारण हजारों किसानों ने भी हिंसा का रास्ता पकड़ लिया। हर कबीले के पास अपने स्थानीय हथियार और अपनी छोटी-सी सेना तो होती ही थी। उसी की मदद से स्थानीय सरकारी कार्यालयों पर हमले किए जाने लगे। सेना के जवानों में भी बड़ी संख्या में ग्रामीण क्षेत्रों के युवा ही थे। धीरे-धीरे उन्होंने भी विद्रोह शुरू कर दिया और इस तरह लगभग आधे सैनिकों ने सेना को छोड़कर आतंकी गुटों से हाथ मिला लिया।

इसके परिणामस्वरूप ऐसी स्थिति बन गई कि अब देश के कई इलाके पूरी तरह से अफ़गान सेना और सरकार के हाथों से निकल चुके थे। वैसे भी अधिकतर लोगों की निष्ठा अपने-अपने कबीलों के लिए थी, इसलिए देश की एकता जैसी बातें उनके लिए कोई मायने नहीं रखती थी। अफ़गानिस्तान की यह प्रशासकीय अस्थिरता आज भी जारी है।

मार्च 1979 में हेरात में एक बड़ा विद्रोह हुआ, जिसमें सेना की एक पूरी यूनिट ही पाला बदलकर आतंकी गुटों से मिल गई। सैकड़ों रूसी अधिकारी उस समय हेरात में तैनात थे। उन्हें और उनको परिवार वालों को विद्रोहियों ने मौत के घाट उतार दिया। हजारों लोग मार डाले गए। इस विद्रोह को कुचलने के लिए सरकार को काबुल और कंधार से सेना की टुकड़ियाँ और बमवर्षक विमान भेजने पड़े। इस विद्रोह का नेतृत्व इस्माइल खान ने किया था। वह बचकर भाग निकला और आगे चलकर वह मुजाहिदीन आतंकी समूह के प्रमुख नेताओं में से एक बना। हेरात के विद्रोह के बहाने अमीन ने सरकारी दमन को और भी तेज कर दिया। धीरे-धीरे यह इतना बढ़ गया कि आगे चलकर अमीन ने तराकी को ही पद से हटा दिया और स्वयं को प्रधानमंत्री घोषित कर दिया।

हाफ़िजुल्ला अमीन का जन्म 1921 में हुआ था। काबुल विश्वविद्यालय से गणित और भौतिकी में डिग्री लेने के बाद उन्होंने एक स्कूल में पढ़ाना शुरू किया। आगे 1957 में एमए और दोबारा 1962 में पीएचडी की पढ़ाई के लिए वे अमरीका में कोलंबिया और विस्कॉन्सिन में रहे। मार्क्सवाद और वामपंथ से उनका पहला संपर्क अमरीका में ही आया था। अब उन्होंने अमरीका में अफ़गान छात्रों के बीच वामपंथ का प्रचार शुरू कर दिया। इसकी भनक लगते ही अफ़गान सरकार ने 1965 में उन्हें अफ़गानिस्तान वापस लौटने का आदेश दिया। वहाँ लौटकर भी उन्होंने अपनी गतिविधियाँ  जारी रखीं और पीडीपीए की स्थापना में सक्रिय भूमिका निभाई। अपने करियर में अमीन ने कई स्कूलों में शिक्षक और प्राचार्य के रूप में काम किया। इस दौरान उन्होंने बड़ी संख्या में छात्रों को वामपंथी विचारधारा से जोड़ा। इन्हीं में से बहुत-से छात्र पढ़ाई पूरी करने के बाद सेना और अन्य सरकारी विभागों में भी नियुक्त हुए। 1978 की ‘क्रांति’ में अमीन को बड़े पैमाने पर इन्हीं कॉमरेडों से मदद मिली थी।

अमीन और तराकी के विवाद को सुलझाने में रूस हर तरह से प्रयास कर रहा था। लेकिन लगभग हर बार ही इसमें विफलता हाथ लगती थी क्योंकि दोनों में से कोई न कोई नेता रूसियों की सलाह मानने से इनकार कर देता था। अंततः मार्च 1979 में अमीन ने तराकी को ही पद से हटाकर सत्ता अपने हाथों में ले ली। अंततः सितंबर 1979 में तराकी और अमीन के ही अंगरक्षकों के बीच हुई हिंसक झड़प और गोलीबारी में तराकी की मौत हो गई। 

अमरीका ने सॉर क्रांति के बाद तटस्थ रहने का निर्णय लिया था। रूस ने खुलकर इस क्रांति का समर्थन किया, इसके बावजूद भी अमरीका ने अफ़गानिस्तान की नई सरकार के खिलाफ कोई बात नहीं कही थी। लेकिन फरवरी 1979 खल्क गुट के ही वामपंथी उग्रवादियों ने अफ़गानिस्तान में अमरीकी राजदूत का अपहरण कर लिया और बदले में खल्क गुट के लोगों को जेल से रिहा करने की मांग रखी। अमरीकी सरकार ने तराकी को सलाह दी कि राजदूत को छुड़ाने के लिए उनकी जान खतरे में डालकर कोई सैन्य ऑपरेशन न किया जाए। लेकिन तराकी ने यह बात नहीं मानी और राजदूत को छुड़ाने के लिए सेना भेज दी। उसी घटना में अमरीकी राजदूत की मौत हो गई। अब अमरीका आगबबूला हो गया। अफ़गानिस्तान की आर्थिक मदद रोक दी गई और राजनयिक संबंध भी बहुत सीमित कर दिए गए। अमरीका की देखा-देखी कई पश्चिमी देशों ने भी वही किया। पाकिस्तान में चल रही अफ़गान-विरोधी गतिविधियों के लिए भी समर्थन बढ़ा दिया गया। दिसंबर 1978 तक ही लगभग 80 हजार अफ़गान आतंकियों को पाकिस्तान में प्रशिक्षण मिल रहा था। सितंबर 1979 में तराकी की मौत के समय तक यह संख्या बढ़ते-बढ़ते 2 लाख हो चुकी थी।

तराकी और अमीन के बीच आपसी संघर्ष बहुत पुराना था। लेकिन जब 1978 में वामपंथी सरकार बनने के बाद भी यह चलता ही रहा, बल्कि सत्ता मिलने के बाद यह और भी बढ़ता गया, तो सोवियत रूस को भारी चिंता हुई। सॉर क्रांति का रूस ने खुलकर समर्थन किया था और इसे वामपंथ की जीत बताया था। यह नई वामपंथी सरकार वास्तव में रूस के प्यादों की ही सरकार थी। इसलिए रूस को चिंता थी कि यदि यह सरकार इन दो नेताओं की आपसी प्रतिस्पर्धा के कारण अथवा आतंकियों की लगातार बढ़ती शक्ति के कारण खत्म हो गई, तो अन्य देशों में भी इसी तरह वामपंथी सरकारों के विरुद्ध आंदोलन शुरू हो जाएंगे और दुनिया-भर में वामपंथ का किला ढह जाएगा। रूस की यह चिंता काल्पनिक भी नहीं थी। पिछले कई वर्षों से ही अफ़गान सेना और सरकार में रूसी अधिकारी या रूस के मोहरे काम कर रहे थे, इसलिए रूस को अफ़गान सरकार में चल रही इस भीतरी उठापटक की पूरी-पूरी जानकारी थी। वह अमरीका और रूस के बीच चल रहे शीत-युद्ध का भी दौर था और रूसी वामपंथ की पराजय का मतलब अमरीकी पूंजीवाद की जीत भी हो सकता था क्योंकि पाकिस्तान में पल रहे अफ़गान विरोधी आतंकी समूहों को हथियार और पैसा अमरीका से ही मिल रहा था। इन सब बातों के कारण सोवियत पॉलिट ब्यूरो में लंबे समय से इस बात पर विचार-विमर्श जारी था कि अफ़गानिस्तान की समस्या का क्या हल निकाला जाए।

प्रारंभ में रूस दो विकल्पों पर विचार कर रहा था। एक तो तराकी और अमीन को हटाकर राजा ज़हीर शाह को वापस लाएं और अफ़गानिस्तान में फिर से राजतंत्र स्थापित करके अपने किसी समर्थक को प्रधानमंत्री पद पर नियुक्त किया जाए। दूसरा विकल्प यह था कि सीधे सैन्य कार्यवाही करके इस सरकार को हटा दिया जाए और अफ़गानिस्तान को सीधे-सीधे अपने नियंत्रण में ले लिया जाए।

अमीन को भी अपनी सत्ता खतरे में दिख रही थी। उनकी सरकार के खिलाफ लोगों की भावनाएं लगातार उग्र होती जा रही थीं और उधर अफ़गान आतंकियों को पाकिस्तान व अमरीका से मिलने वाली मदद भी बढ़ती जा रही थी। काबुल में लगातार अमीन के समर्थक अधिकारियों की हत्याएं हो रही थीं और सत्ता में अमीन की पकड़ दिन-ब-दिन कमज़ोर होती जा रही थी। उधर रूसी खुफ़िया एजेंसी केजीबी की आशंका बढ़ रही थी कि अमरीका की खुफ़िया एजेंसी सीआईए भी काबुल में सक्रिय है और अमरीका ने अफ़गानिस्तान को अपने पाले में खींचने का प्रयास तेज कर दिया है। अमीन ने जब अपनी सरकार के खिलाफ चल रहे आंदोलन को रोकने की कोशिश में अमरीका और पाकिस्तान से समझौते की गुहार लगाई, तो रूस को अब यह आशंका भी लगने लगी कि कहीं अपनी सरकार बचाने के लिए अमीन रूस के ही इन दुश्मनों से हाथ न मिला ले। इसलिए अब जल्दी ही कुछ करना जरूरी हो गया था।

अंततः रूसी पॉलिट ब्यूरो ने सैन्य अभियान के लिए सहमति दे दी। रूस को विश्वास था कि अमरीका भले ही अफ़गानिस्तान में खुफ़िया ऑपरेशन के द्वारा तख्तापलट की कोशिशें कर रहा हो, लेकिन युद्ध की स्थिति में अमरीका दूर ही रहेगा क्योंकि कुछ ही समय पहले वियतनाम युद्ध में हार के कारण अमरीकी सेना का मनोबल गिर गया था, इसलिए अमरीका एक और युद्ध में उलझने का जोखिम नहीं उठाने वाला था। उसी वर्ष नवंबर 1979 में ईरान में उग्रवादी गुट के छात्रों ने अमरीकी राजनयिकों को बंधक बना लिया था। उस घटना के कारण भी अमरीका अब फूँक-फूँक कर कदम रख रहा था।

दूसरी तरफ ईरान में अयातुल्लाह खोमेनी के नेतृत्व में वहाँ का राजा का तख्तापलट कर दिया था और ईरान में कट्टर इस्लामी शासन की स्थापना कर ली थी। इससे भी रूस को डर था कि अगर जल्दी ही अफ़गानिस्तान में सैन्य कार्यवाही नहीं की, तो पाकिस्तान में प्रशिक्षण ले रहे मुजाहिदीन ही अफ़गानिस्तान पर कब्जा करके वहाँ भी ईरान जैसा कट्टरपंथी शासन स्थापित न कर ले। इन सब बातों को सोचते हुए अंततः दिसंबर 1979 में पॉलिट ब्यूरो ने सैन्य अभियान को स्वीकृति दे दी। चूँकि अफगान सेना में पहले से ही बड़ी संख्या में रूसी अधिकारी और समर्थक मौजूद थे, इसलिए इसमें बहुत ज्यादा खतरे की आशंका नहीं थी। 

इस ऑपरेशन को हरी झंडी मिलते ही 20 से 25 दिसंबर के बीच हजारों की संख्या में रूसी सैनिक, टैंक और विमान अफ़गानिस्तान में दाखिल होने लगे। इन्हें अफ़गान सरकार की मदद के बहाने भेजा जा रहा था। 27 दिसंबर तक लगभग 50 हजार रूसी सैनिक अफ़गानिस्तान में दाखिल हो चुके थे। काबुल, कंधार, जलालाबाद और हेरात जैसे सभी महत्वपूर्ण सैन्य ठिकानों पर रूसी सेना ने अपने टैंक, युद्धक विमान और मिसाइलें तैनात कर दी थीं। 

27 दिसंबर को ही सोवियत सेना ने काबुल की टेलीफोन सेवा और रेडियो स्टेशन को अपने कब्जे में ले लिया। उसके तुरंत बाद ही अफ़गान सैनिकों जैसी वर्दी में रूसी सैनिक प्रधानमंत्री अमीन के आधिकारिक निवास में घुस गए। इसके बाद हुई गोलीबारी में अमीन के अंगरक्षकों के साथ-साथ स्वयं अमीन की भी हत्या कर दी गई।

इस तरह सॉर क्रांति के लगभग डेढ़ वर्ष के भीतर ही अफ़गानिस्तान में फिर एक बार तख्तापलट हो गया और अफ़गान इतिहास के एक नए अध्याय की शुरुआत हुई। अगले दस वर्षों तक रूसी सेना और अफ़गान जिहादियों के बीच हिंसक युद्ध चलता रहा। उसकी बात मैं अगले भाग में करूँगा।

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